बोध कथा: अपना अपना उसूल

बोध कथा: अपना अपना उसूल

महात्मा जीलानी एक विद्वान, कर्तव्यनिष्ठ और दीन-दुखियों के सहायक थे, वे नियमों के भी बड़े पक्के थे।

एक बार वहां के राजा ने उन्हें एक पुस्तक लिखने का काम सौंपा। क्योंकि महात्मा जीलानी एक संत थे इसलिये वे दिन भर दीन दुखियों और असहायों की सेवा में लगे रहते थे, इसी कारण दिन में उन्हें पुस्तक लिखने का समय नहीं मिल पाता था। पुस्तक लिखने के लिये उन्होंने रात का समय चुना था, दिन छिपते ही वे दीपक जलाकर लिखने का काम आरंभ कर देते थे। बीच बीच में कुछ समय के लिये उन्हें अपने निजी कार्य भी करने होते थे।

उनके पास दो दीपक थे। दोनों में तेल भरा रहता था। जब महात्मा पुस्तक लिख रहे होते तो वे पहला दीपक जलाते थे।

जब निजी काम करना होता तो वे पहले दीपक को बुझाकर दूसरा दीपक जला लेते थे। निजी काम निपटाने के बाद दीपक बुझाकर फिर से वे पहला दीपक जला कर पुस्तक लेखन कार्य में लीन हो जाते थे।

उनके शिष्य अपने गुरू को रोज ऐसा करते हुए देखते थे। वे असमजंस में थे। यह बात उनकी समझ में नहीं आ रही थी कि गुरूदेव प्रतिदिन बार बार दो दीपकों को जलाकर काम क्यों करते हैं? जब एक दीपक से ही काम चल सकता है तो दूसरा क्यों?

उत्सुकतावश, एक दिन एक शिष्य ने पूछ ही लिया ''गुरूदेव। आप नित्य दो दिये जलाते हैं। जब आप लिखते हैं तो पहला दिया जलाते हैं और दूसरों कामों को लिये आप दूसरा दीया जलाते हैं। कृपा करके आप हमें दो दियों के जलाने का रहस्य बताइये।

शिष्य की बात सुनकर महात्मा जीलानी मुस्कुराने लगे। वे शिष्य से बोले इसमें रहस्यवाली कोई बात नहीं है। यह तो सीधी साधी बात है। देखो, जब मैं पुस्तक लिखता हूं तो मैं राज्य का काम कर रहा होता हूं। इसका तेल मुझे राज्य की ओर से प्राप्त होता है। दूसरा दीपक मैं उस समय जलाता हूं जब मैं अपना निजी कार्य करता हूं। इसमें मेरा खर्चा होता है।

शिष्य फिर बोल उठा अगर आप अपना निजी कार्य भी राज्य से मिलने वाले तेल से ही करें तो क्या हानि हो जायेगी?

गुरूदेव उत्तेजित हो उठे, बोले हां, बहुत हानि होगी। जब हम भ्रष्टाचार में लिप्त होकर देश का धन अनाधिकार रूप से प्रयोग में लायेंगे तो अपने देश के प्रति, देश की जनता के प्रति गद्दारी ही तो करेंगें।

शिष्य आगे कुछ नहीं बोला।

- परशुराम संबल

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