बाल कथा: नन्हें का बलिदान

बाल कथा: नन्हें का बलिदान

भारतीय इतिहास अमर बलिदानियों की अनेक गाथाओं से परिपूर्ण है किन्तु कुछ ऐसे भी बलिदानी हुए हैं जिनकी गाथा इतिहास के पृष्ठों तक पहुंच नहीं सकी। इतिहास पुरूषों की ध्येय साधना में उस निष्काम साधक की कहानी भी प्रकाश में नहीं आ पाई।

घटना महाराणा प्रताप के जीवनकाल की है जब वह मुगल सेनाओं से अपने देश की रक्षार्थ संघर्ष करते हुए स्वातंत्रय की यज्ञवेदी पर अपने सर्वस्व को होम कर जंगलों और पहाडिय़ों में छिपकर कष्टमय जीवन व्यतीत कर रहे थे और भविष्य के अपने ध्येय की पूर्ति के प्रति चिंतित थे।

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बड़े जंगल के साथ सटा हुआ यह एक पहाड़ी इलाका था। सायंकाल के समय उस दिन आकाश में बादल छाये हुए थे जिससे सम्पूर्ण पहाड़ी क्षेत्र अंधकार के आंचल में सिमटा हुआ था।

एक झोंपड़ी में एक बालक मां को रोटी बनाते देखकर मुंह में बार-बार जीभ चला रहा था।

उसकी आयु लगभग बारह वर्ष के आसपास थी। भूख की व्याकुलता से उसका बुरा हाल था। पितृविहीन बालक को तीन दिनों के बाद रोटी नसीब हो रही थी। अचानक उसके दिमाग में एक विचार कौंधा और उसने भोलेपन से मां से पूछा-मां!

महाराणा प्रताप कई दिनों से ऊपर पहाड़ी पर छिपे हुए हैं। चारों तरफ से उन्हें शत्रुओं ने घेर रखा है, फिर वे भोजन कैसे करते होंगे?

माता का हृदय बालक के उदगार सुनकर प्रसन्न हुआ परन्तु अगले ही क्षण वह चिंतित होकर बोली-बेटा न जाने कैसी हालत होगी उनकी? उनके साथ छोटे बच्चे भी हैं। कई दिनों से उन्हें अन्न का एक दाना भी नसीब नहीं हो सका है।'बालक किसी गहरी सोच में डूब गया। उसकी अपनी भूख भाग चुकी थी। उसने मां से कहा - मां! मैं यह रोटी महाराणा प्रताप और उनके बच्चों को पहाड़ी पर देने जाऊंगा।

मां का मातृत्व पिघल उठा। वह बच्चा उसका एक ही सहारा था परन्तु उसका विचार महान् था। वह बालक के सिर पर स्नेह से हाथ फेरते हुए बोली-लेकिन बेटा चारों ओर तो शत्रुओं का पहरा है। रोटी देने कैसे जाओगे?

बालक ने कहा-मां! इस समय चारों ओर अंधेरा है। कुछ दिखाई नहीं दे रहा होगा।

मैं पहाड़ी के रास्तों से पूर्णत: परिचित हूं जिसमें मुझे उनकी आंखों से बचकर निकल जाने में सफलता प्राप्त होगी। बस मां! तुम्हारे आशीर्वाद की आवश्यकता है।

मां ने बालक को अपने हृदय से लगा लिया और आंसुओं की एक अविरल धारा उसके नेत्रों से बह निकली। यह मौन स्वीकृति थी उसे मां की, जो अपनी एकमात्र संतान को देश पर न्यौछावर होने को प्रेरित कर रही थी।

रोटियों की पोटली बांधकर ज्यों ही वह बालक झोंपड़ी से बाहर निकला, उसी समय जोर से बादल गरजे, बिजली चमकने लगी और मूसलाधार बारिश होने लगी परन्तु वह बालक अपने ध्येय के मार्ग से बिलकुल विमुख न हो कर बाधाओं का बहादुरी से सामना करने का निश्चय करके अविचल भाव से अपने अभीष्ट लक्ष्य की ओर बढ़ चला।

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अचानक जोरों से बिजली चमकी। नीचे से आते हुए मुगल सैनिक ने एक परछाई को पहाड़ी पर जाते हुए देखा। अंदाज से अपनी कटार निकालकर अंधकार में ही फेंक दी। वह कटार बालक के पीठ पर जोर से लगी किन्तु बालक के मुंह से चीख नहीं निकली। एक क्षण भी विचलित न होते हुए उसने नीचे की तरफ सिपाही को लक्ष्य बनाकर एक पत्थर लुढ़का दिया। वह सैनिक मर चुका था।

असह्य दर्द को अपनी देशभक्ति के जज्बे से सहन करता हुआ, गिरता-पड़ता वह गंतव्य तक जा पहुंचा। बाहर से द्वार पर दो-चार थपकियां देकर वह औंधे मुंह नीचे जमीन पर गिर पड़ा। आवाज सुनकर महाराणा प्रताप द्वार खोलकर संशय भरी अवस्था में बाहर आये। मशाल की धीमी रोशनी से एक बालक को घायल अवस्था में पाया। उसके हाथ में रोटी की पोटली सख्ती से भिंची थी तथा चेहरे पर सफलता की आभा थी।

महाराणा प्रताप को समझते देर नहीं लगी। बालक ध्येय की वेदी पर शहीद हो चुका था। इस अमर सपूत का नाम दुग्धा था।

महाराणा प्रताप ने स्नेह से उसका मस्तक चूमा और अश्रुपूर्ण नेत्रों से उस निष्काम योगी को चिर विदाई दी। महाराणा प्रताप ने उस रोटी को ग्रहण किया और मुगलों को परास्त किया।

- परमानंद परम

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