बाल जगत/ जानकारी: भारतीय परंपरा का वृक्ष-बरगद

बाल जगत/ जानकारी: भारतीय परंपरा का वृक्ष-बरगद

एक अनुश्रुति है कि इलाहाबाद के दुर्ग में स्थित अक्षयवट कई कल्पों से जीवित है। सुप्रसिद्ध इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार ने अपने ग्रन्थ 'शिवाजी' में जहांगीर के समय की एक घटना का उल्लेख किया है।

सम्राट जहांगीर ने इलाहाबाद के अक्षयवट को जड़ से कटवा दिया। इसके बाद उसने जड़ की ठूंठ में लाल गरम लोहे की सलाख ठोंक देने का आदेश दिया। इस कार्य से वह बड़ा खुश हुआ कि उसने अक्षयवट को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया पर एक वर्ष के अन्दर ही अक्षयवट की ठूंठ से हरे पत्ते निकलने लगे।

उपर्युक्त उदाहरण के संबंध में इतिहासकारों में मतभेद हो सकता है पर इसका तात्पर्य स्पष्ट है कि भारतीय जीवन दर्शन में, वृक्षों के अमरत्व और उनकी पवित्रता का संवेदनात्मक भाव से समावेश किया गया था। तब वृक्षों की संरक्षण भावना में आधुनिक शोषणवादी उद्देश्य का अभाव था। इसी तरह कुछ लोग बिहार में गया स्थित अक्षयवट का नाश प्रलय के बाद भी नहीं मानते। इसलिए बरगद अक्षय वृक्ष कहा जाता है। रॉयल बुलेटिन की नई एप प्ले स्टोर पर आ गयी है।royal bulletin news लिखे और नई app डाउनलोड करें

भारतीय उपासना पद्धति में वटवृक्ष का अपना स्थान है। संतान कामना और सौभाग्य के लिए स्त्रियां बरगद की पूजा अर्चना करती हैं। महिलाएं वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ माह की त्रयोदशी से पूर्णिमा तक रखती हैं। हल्दी केशर युक्त कच्चे धागे तने के चारों ओर लपेट कर और दीप जला कर पूजा की जाती है।

भक्ति साहित्य में भी वट वृक्ष को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। रामचरित मानस में गोस्वामी जी ने इसे आस्था और विश्वास का प्रतीक माना है। बालकांड में एक प्रसंग है। पार्वती के मन में यह शंका जागृत हो जाती है कि दशरथ पुत्र राम ईश्वर कैसे हो सकते हैं। शिव के विश्वास दिलाने पर भी वे नहीं मानती। शिव पार्वती से कहते हैं

जो तुम्हारे मन अति संदेहु।

तो बिन जाये परीक्षा लेहू।।

जब लग बैठ अहऊं बट छांही।

तब लग ऐहहू मोहि पाहीं।।

शिव विश्वास के प्रतीक वट की छाया तले बैठ गये हैं पर पार्वती संशय के वन में भटक रही हैं।

आधुनिक साहित्य में भी बरगद, ग्रामीण एवं शहरी दलित शोषित जनों की आशा आकांक्षा का प्रतीक है। बाबा नागार्जुन ने अपने आंचलिक उपन्यास बाबा बटेसर नाथ में वटवृक्ष को केन्द्र में रख कर भारतीय ग्रामीण जनजीवन का सफल चित्रण किया है। भारतीय बरगद हमारी परंपरा का वृक्ष है। रॉयल बुलेटिन की नई एप प्ले स्टोर पर आ गयी है।royal bulletin news लिखे और नई app डाउनलोड करें

वट वृक्ष भारत के अतिरिक्त सम्पूर्ण दक्षिण पूर्व एशिया में पाया जाता है। चीन, जापान, थाइलैण्ड, हांग कांग, वियतनाम, लाओस, कम्पूचिया, इन्डोनेशिया और बाली में यह पूजनीय वृक्ष है। इन देशों में हिन्दू पूजास्थलों को महिमा मंडित करता है।

ताड़वृक्ष के लिए एक कहावत है। सौ वर्ष खड़ा तो सौ वर्ष पड़ा। अंकोरवाट में प्राचीन हिन्दू मंदिरों और परकोटे के मध्य विगत आठ सौ वर्षों से विशालकाय वटवृक्ष खड़े हैं। बरगद के लिए सौ वर्ष कुछ भी नहीं है। वाराणसी में शिवपुर के पास, एक विशाल बरगद तहसील कार्यालय के समीप सड़क के बीच स्थित है। एक एकड़ के क्षेत्र में इसकी शाखा-प्रकाखायें फैली हुई हैं। लोहे की रेलिंग से यह गोल घेर दिया गया है।

कलकत्ता का विशाल बरगद एशिया के सबसे विशाल वृक्षों में गिना जाता है। थियोसोफिकल सोसायटी के मद्रास स्थित केन्द्रीय कार्यालय में आहाते में एक प्राचीन वट वृक्ष है। कुछ वर्षो पहले यह पेड़ तूफान से उखड़ गया था। उखड़े हुए विशाल वृक्ष को देख कर लोग द्रवित हो गए। उन्होंने पुन: इसे अपनी जगह पर खड़ा कर दिया।

बरगद में औषधीय गुण भी हैं। इसका दूध गठिया और कमर दर्द में लाभदायक है। इसके पत्तों की राख को सरसों के तेल में मिला कर लगाने से खुजली में आराम मिलता है। इसका दूध पैरों की बिवाई में लगाने से ठीक हो जाती है। दांत दर्द में भी इसका दूध उपयोगी है। इसकी कच्ची कोपलों को वीर्यवद्र्धक बताया गया है।

जब किसी पक्षी की बीट के माध्यम से बड़ का बीज किसी वृक्ष के तने के कोटर में अथवा दीवार की फटी दरार में या उपजाऊ धरती के किसी सुरक्षित गढ़े मेें प्रवेश कर जाए, तब मिट्टी और जल के संसर्ग से अंकुरित नन्हा पौधा सूर्य की किरणें पा कर सतह से ऊपर उठने लगता है। नये कोंपल फूटने लगते हैं। वट के विशाल रूप धारण करने में कई दशक लग जाते हैं। शाखा प्रशाखाएं बढ़ती रहती हैं। मोटी शाखाओं से अधोगामी जटाएं फूट कर निकलती हैं। ये जटाएं पुन: जमीन में प्रवेश कर जाती है। सभी वृक्ष जगह घेरते हुए बढ़ते हैं।

बरगद जगह क्या घेरते हैं, पसरते जाते हैं। ऊपर हरे चौड़े पत्तों का शामियाना तन जाता है। बीच-बीच में जमीन में गड़ी हुई जटाएं तना बन कर पुष्ट होने लगती हैं। इस तरह विशाल छतनार बरगद शहर, गांव, तालाब के किनारे अथवा मंदिर के अहाते में ठाठ से चबूतरे पर विराजता है। आज भी ग्रामीण अपने गांव के बरगद को बड़ी श्रद्धा से 'बटदादा' या 'बाबा बटेसर' नाम से संबोधित करते हैं।

- कमला प्रसाद यादव

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