बाल कथा: बच्चों पर बढ़ता बोझ

बाल कथा: बच्चों पर बढ़ता बोझ

आजकल की भाग दौड़ भरी जिंदगी में मातापिता अपने बच्चों की देखभाल एवं पालन पोषण के लिए उचित समय भी नहीं निकाल पाते। माता-पिता तो दिन भी अपने कामों में लगे होते ही हैं। बच्चे भी भाग दौड़ में शामिल हो चुके हैं। सुबह स्कूल फिर घर, ट्यूशन, शाम को हॉबी क्लासीज वगैरह।

सुनीता और उसके पति विशाल दोनों ही सरकारी कर्मचारी हैं। इसलिए बच्चे को जो कि पांच वर्ष का है, सुबह क्रच में छोड़ देते हैं। स्कूल की वैन स्कूल से बेटे को क्रेच ले जाती है। माता-पिता के फ्री होने पर उसे कोई एक लेने आ जाता है। घर जाकर कुछ देर आराम या खा पी कर वे फिर निकल पड़ते हैं बेटे की डांस क्लास, स्केटिंग या और दूसरी क्लासीज के लिए।

घर आते-आते शाम के 6-7 बज जाते हैं। इस बीच बच्चे को भी कहां आराम मिलता है। बच्चा भी अपनी मर्जी से खाना पीना नहीं कर सकता। यह सब हमारी जिन्दगी का हिस्सा है। अगर यह सब नहीं करेंगे तो बच्चा पीछे रह जाऐगा। इसी तरह हम अपनी इच्छाएं तो बच्चों पर लादते हैं ही साथ ही बच्चों को भी तनाव का शिकार बना देते हैं। बच्चों को खुली हवा में खेलने कूदने का समय नहीं मिल पाता है। बच्चों पर जहां तक हो सके, कम बोझ डालना चाहिए।

. बच्चों को उनकी इच्छा के बारे में पूछना चाहिए कि वे किस खेल या क्लास को ज्वाइन करना चाहते हैं।

. बच्चे को देखें कि वो आपकी इच्छा के अनुसार चलता चलता कहीं थक या ऊब न जाएं।

. बच्चे को हर गतिविधि के बारे में पूछे। उससे हर दोस्त के बारे में सुनें। चाहे आप उसके दोस्तों को न जानते हों पर आप बातों द्वारा जान सकते हैं।

. समय निकाल कर बच्चों को अपनी बातें कहने दें, आप सुनें। बीच में टोकें नहीं। उसकी बात को भी महत्त्व दें।

. बच्चे को भी अपनी पढ़ाई, नंबर एवं अनेक प्रकार के तनाव होते हैं। कम नंबर आने पर और मेहनत करने को कहें।

. बच्चे को उसके शारीरिक ढांचे आदि के लिए न कोसे जैसे तू छोटा है, कद बढ़ाओ, चुस्त बनो, सुस्ती छोड़ो आदि।

. बच्चे को प्यार से समझाएं और उसके द्वारा किए गए कामों की सराहना करें चाहे वे छोटे-छोटे ही क्यों न हों।

- श्वेता कोहली

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