बाल कथा: जाति का ढोल

बाल कथा: जाति का ढोल

एक बार आचार्य जे. बी. कृपलानी रेल से यात्रा कर रहे थे। रेल के तृतीय श्रेणी के जिस डब्बे में वे बैठे थे, वहीं उनकी बगल में मोटे-से तिलकधारी सेठ भी बैठे हुए थे। उन्होंने कीमती वस्त्र पहन रखे थे। सिल्क का कुरता, उसमें सोने के बटन, बढिय़ा धोती और सिर पर पगड़ी और आंखों पर सुनहरा चश्मा। अपने पास बैठे हुए देखकर उन्हें कुछ शंका हुई और उन्होंने आचार्य जी से पूछ ही लिया-'नेता जी, आप कौन जाति के हैं? माफ करना जरा खास काम है इसलिये आपसे पूछने की हिम्मत की।'

आचार्य कृपलानी जी सेठ की तरफ देखकर मुस्कुराए और बोले-'जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान, मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान, वाली कहावत तो अपने सुनी ही होगी सेठ जी।'

सेठ जी हें हें करके बोले-'ठीक है जी, साधु से जाति नहीं पूछेंगे पर माफ करना, आपने तो साधु वाले गेरूए वस्त्र पहन नहीं रखे। खादी तो आजकल मेहतर से लेकर ब्राह्मण तक पहन रहे हैं। यदि आपको अपनी जाति बताने में कोई एतराज हो तो खुलकर बोलो?'

'नहीं सेठ जी, जाति बताने या छिपाने से कुछ नहीं होता परन्तु आपको मेरी जाति पूछकर लाभ क्या होगा?' आगे कुछ कहे बिना ही आचार्य जी अखबार पढऩे लगे परन्तु सेठ तो उनकी जाति जानने के लिये बहुत ही उत्सुक था। उसने उनसे फिर आग्रह किया-'पर श्रीमान जी, आपको मुझे अपनी जाति बताने में क्या संकोच है?'

इस पर आचार्य थोड़ा सा झुंझला कर बोले-'मैं किसी जाति का हूं तो बताऊं भी।'

सुनकर सेठ ने उन पर एक दम व्यंग्य कस दिया, बोले-'नेताजी, फिर आप को वर्णशंकर मान लिया जाये। लगता है आपके पिता ने किसी गैर जाति की लड़की से विवाह रचा लिया होगा?Ó

सेठ ने पिता के चरित्र पर चोट की थी। फिर भी वे विचलित नहीं हुए और मार्मिक व्यंग्य की शैली में चुटकी लेते हुए सेठ से बोले-सेठ जी, अगर आप जाति ही पूछ रहे हो तो सुन लीजिए। सवेरे जब मैं गांधी जी के जीवन को व्यवहार में लाने के लिये घर-आंगन और शौचालय की सफाई करता हूं तो मैं भंगी होता हूं। जब मैं अपने जूतों की सिलाई करता हूं तो चमार बन जाता हूं। दाढ़ी बनाते समय नाई, कपड़े धोते वक्त धोबी, पानी भरते समय कहार, घर का बाग-बगीचा संभालते समय माली, हिसाब किताब करते समय बनिया और कॉलेज में विद्यार्थियों को पढ़ाते वक्त ब्राह्मण हो जाता हूं। अब निर्णय कीजिए कि मैं किस जाति का हूं?'

बहुत देर से वार्तालाप सुन रहे डिब्बे के अन्य यात्री आचार्य कृपलानी जी के उत्तर से प्रभावित हो उठे और सेठ जी की मूर्खता पर एक साथ ठहाका लगाकर हंस पड़े। लोगों को इस तरह हंसते हुए देखकर सेठ जी की दशा देखते ही बनती थी।

तभी स्टेशन आ गया। कृपलानी जी को यहीं उतरना था। बाहर उनकी प्रतीक्षा में भीड़ खड़ी थी। डिब्बे से उतरते ही लोगों ने उन्हें फूलमालाओं से लाद दिया और चरण छुए।

सेठ जी आश्चर्यचकित होकर आचार्य जी के अभिवादन का नजारा देख रहे थे। उन्होंने एक सहयात्री से पूछ ही लिया-'ये नेता जी कौन हैं?'

'ये आचार्य जे. बी. कृपलानी हैं।' आचार्य जी का नाम सुनकर सेठ शर्म से पानी-पानी हो गया और नीचे उतर कर हाथ जोड़ क्षमा मांगने लगा।

तब कृपलानी जी ने उन्हें बस इतना ही कहा-'व्यर्थ ही में जाति की श्रेष्ठता का ढोल पीटना छोड़ो। भारतीयों के रूप में सबको एक सूत्र में बांधो। बस यही क्षमा है।'

-परशुराम संबल

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