डर एक रोग है, इसे छोडि़ए

डर एक रोग है, इसे छोडि़ए

डर एक मानसिक रोग है जो अच्छी-खासी विचार प्रणाली को जर्जर कर देता है। यूं तो यह जीवन की एक सहज प्रवृत्ति है व नियम, व्यवस्था और अनुशासन बनाए रखने के लिए एक हद तक उपयोगी भी है तथा सुरक्षा, बचाव, सावधानी के लिए आवश्यक भी है।

भय इस सीमा तक तो ठीक है मगर सदा डरे सहमे रहना, मूढ़ता, जड़ता, संत्रस व आतंक पैदा करना ठीक नहीं है। इससे भीरूता ही पैदा नहीं होती बल्कि मनोबल भी कमजोर होता है। व्याकुलता, बेचैनी, अधीरता एवं अस्थिर मन: स्थिति के चलते कुकल्पनाओं के समन्दर में डूबते-उतराते मनुष्य न सिर्फ अपने चिंतन को बिगाड़ लेता हैं वरन् उसके स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर पड़ता है।

मनोवैज्ञानिकों का दावा है कि जितने लोग बीमारी से मरते हैं, उससे अधिक भय, व्यर्थ की चिंता व खोखली कल्पनाओं के कारण मर जाते हैं। कितने ही लोग बीमारी को लेकर दुविधा में आ जाते हैं, सोचते रहते हैं कि अब वे नहीं बच सकते और हर घड़ी मृत्यु को अपने सिर पर देखते हैं या फिर ओझा, ज्योतिषी आदि की बातों पर यकीन कर असमय काल के गाल में समा जाते हैं।

ऐसे ही अनेक मनुष्य मर जाते हैं कि जिन्हें यथार्थ में कोई बीमारी नहीं होती। भयभीत शख्स को रस्सी का सांप और झाड़ी का भूत नजर आना व्यर्थ नहीं, क्योंकि उस वक्त समस्त विचार-तंत्र यकीनन लुंज-पुंज अवस्था में होता है। भय से संपूर्ण शारीरिक प्रक्रिया गड़बड़ा जाती है, मस्तिष्क का नियंत्रण, पाचन-प्रणाली, हृदय की धड़कन आदि प्रभावित होती है। मांसपेशियों में असाधारण असंतुलन पैदा होता है।

रोग शरीर की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है किंतु कितने ही अपरिपक्व मन: स्थिति के लोग इतने घबरा जाते हैं कि जीवनी-शक्ति बुरी तरह लडख़ड़ा जाती है और रोग में कमी आने के बजाय इजाफा होता जाता है, फिर हड़बड़ाहट में इतनी दवाएं खा ली जाती हैं कि जितना भयंकर रोग नहीं होता उससे भयानक हो जाते हैं उसके दुष्परिणाम।

भय के संस्कार प्राय: बाल्यावस्था में ही जम जाते हैं। इन्हें छुड़ाने अथवा ये स्थायी न हो पायें, इसके लिए आरंभ से ही प्रयासरत रहें। अंधकार, भूत-प्रेत, डाकिन शाकिन से बच्चों को डरायें नहीं। बच्चों की मनोभूमि अच्छी व समझ अपरिपक्व होने के कारण भय के संस्कार बीज बड़ी शीघ्रता से जमने के बाद फिर आजीवन उन्हें उखाड़ पाना असंभव हो जाता है। इन्हीं विश्वासों के आधार पर बालक का व्यक्तित्व ढलता, पनपता है।

समाज में फैले अंधविश्वास और रूढिय़ां ऐसे विश्वासों की पुष्टि कर भय के संस्कारों को और भी सुदृढ़ करते हैं अत: स्वयं इससे छुटकारा पाएं तथा औरों को भी दिलाएं। डर केवल एक

निषेधात्मक अनुभूति है, अत: इसे त्याग कर, उज्जवल भविष्य की कल्पना तथा उसे साकार करने में संलग्न हों। कुछ करते रहने की आदत डाल, दूरदर्शिता व विवेकशीलता अपनाकर भय से मुक्ति पाने का प्रयास करें।

- अंजू वर्मा

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