बाल कथा: पिता की सीख

बाल कथा: पिता की सीख

बिलासपुर गांव में रामप्रसाद नाम का एक व्यक्ति रहता था। वह गांव की पाठशाला में शिक्षक था। वह एक ईमानदार और स्वाभिमान वाला व्यक्ति था। उसने अपने जीवन में किसी के आगे कभी हाथ नहीं पसारा।

बस, अध्यापन कार्य से वेतन रूप में जो भी थोड़ी-सी आय होती थी, उसी में घर का गुजारा चला लेता था। उसके दो लड़के थे।

जब वह वृद्ध हो गया और मृत्यु निकट आ पहुंची तो उसने अपने दोनों बेटों को बुलाया और कहा-बेटो।

मैं तुमको जीवन में सदा सुखी और स्वस्थ रहने के लिए तीन बातें बता रहा हूं। यदि तुम इनका सच्चाई से पालन करोगे तो जीवन में कभी भी अभाव नाम की चीज से तुम्हारा पाला नहीं पड़ेगा।

वे तीन बातें इस प्रकार हैं पहली, फूलों की सेज पर सोना, दूसरी, मोहनभोग खाना और तीसरी, बड़ों के हाथ पैर तोड़ देना, कहकर वृद्ध ने प्राण त्याग दिये।

दोनों बेटे पिता की इस पहेली का कुछ अर्थ नहीं समझ सके। उन्हें पिता की बातों पर आश्चर्य हो रहा था कि गरीबी का जीवन व्यतीत करते हुए फूलों की सेज पर सोना, मोहन भोग खाना किस तरह संभव हो सकेगा? तीसरे बड़ों के हाथ पैर तोड़ देने से क्या हाथ लगेगा?

गांव के मंदिर में एक विद्वान पंडित जी रहते थे। शिक्षक के पुत्रों ने पिता की कही हुई तीनों बातें जाकर पंडित जी को बताई तो उन्होंने पहली का अर्थ समझाते हुए बेटों से कहा- देखो, फूलों की सेज पर सोने का मतलब है कि तुम दोनों इतने कठोर परिश्रम करो कि तुम्हें इतनी अधिक थकान हो जाय कि तुम थककर गहरी नींद का आनन्द ले सको।

मोहन भोग' का मतलब है कि ऐसी कड़ी भूख लगने पर ही कुछ खाया जाये जिससे रूखी-सुखी दाल रोटी, मोहनभोग जैसा स्वाद प्रदान करें।

बड़ों के हाथ पैर तोडऩे का अर्थ यह है कि उनके कामों में हाथ बटाने का सतत प्रयत्न किया जाये ताकि महत्त्वपूर्ण कामों का खूब अनुभव हो सके और उनकी जरा-जरा सी बारीकियां पकड़ में आ सकें। पिता की दी हुई शिक्षा का अर्थ बेटों को समझ में आ गया और उसी दिन से उन्होंने उन पर अमल करना शुरू कर दिया।

-परशुराम संबल

Share it
Share it
Share it
Top