बाल कथा: सच्चा बहादुर

बाल कथा: सच्चा बहादुर

कुश्ती पुराने ज़माने से ही भारतीयों का प्रमुख शौक रहा है। कुश्ती एक सम्मानित कला भी समझी जाती थी क्योंकि इसका संबंध बहादुरी, ताक़त और फुर्ती से रहा है। पौराणिक आख्यानों से पता चलता है कि उस समय मल्ल युद्ध का प्रचलन था जो कि कुश्ती का ही एक रूप है। पुराने राजा-महाराजाओं ने भी कुश्ती को एक कला के रूप में संरक्षण प्रदान किया। मुग़लकाल में भी कुश्ती को काफी प्रोत्साहन मिला लेकिन अंग्रेज़ों का राज स्थापित हो जाने के बाद कुश्ती का महत्व लगातार कम होता चला गया। बाद में लोगों ने काफी प्रयास किये जिससे कुश्ती की प्रतिष्ठा लौट आए।

एक समय की बात है कि कुश्ती के आयोजकों ने फैसला किया कि महात्मा गाँधी को किसी दंगल में बुलाया जाए। गाँधी जी और कुश्ती? वस्तुत: गाँधी जी को बुलाने का उद्देश्य था लोगों को अधिकाधिक संख्या में बुलाना और कुश्ती के प्रति आकर्षण पैदा करना। लोग ज़्यादा संख्या में आएँगे और गाँधी जी भी दर्शकों में होंगे तो कुश्ती की प्रतिष्ठा भी अवश्य ही बढ़ेगी। आयोजक गाँधी जी के पास पहुँचे और गाँधी जी को आने के लिए राजी कर लिया।

दो नामी पहलवानों के बीच कुश्ती होनी थी और गाँधी जी भी कुश्ती देखने आने वाले थे, अत: ख़ूब भीड़ इकटठी हो गई। अखाड़े में उतरने से पहले दोनों पहलवान गाँधी जी के पास आए और पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया। गाँधी जी विनोदप्रिय भी कम नहीं थे। गाँधी जी ने एक लंबे-चौड़े पहलवान की पीठ पर हाथ फेरकर कहा, 'क्यों भाई हमसे कुश्ती लड़ोगे?

पहलवान ने हाथ जोड़ कर अत्यंत विनम्रतापूर्वक जवाब दिया, 'नहीं बापू, हम आपसे कुश्ती नहीं लड़ सकते। आपकी बहादुरी और ताक़त के क्या कहने। आपने तो इतनी ताक़तवर ब्रिटिश हुकूमत को हरा दिया जिसके राज में सूरज भी नहीं छिपता था। हम किस ख्ेात की मूली हैं जो आपसे लड़ें?

सचमुच ऐसी ताक़त थी बापू में कि बड़े-से-बड़े योद्धा भी उनकी ताक़त का लोहा मानने को विवश थे। वस्तुत: अहिंसा और सत्य में वो ताक़त होती है कि शारीरिक बल से उसका मुक़ाबला करना असंभव है।

- सीताराम गुप्ता

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