बाल कथा: जिद्दी चूहा

बाल कथा: जिद्दी चूहा

बहुत पहले की बात है। एक जंगल में एक कौआ और एक चूहा रहते थे। दोनों बहुत पक्के दोस्त थे। जंगल से दूर एक नदी थी। एक दिन चूहे ने कौए से कहा, भाई, मेरी इच्छा है, नदी नहाने को चला जाए।
कौए ने पहले तो मना किया, लेकिन चूहे की जिद्द के आगे उसकी एक न चली। कौए को हां करनी ही पड़ी। चूहे ने जल्दी-जल्दी सामान बांधा। बैग तैयार किया। ओढऩे-बिछाने के कपड़े रखे। तैयार होकर वे दोनों नदी स्नान के लिए चल पड़े।
अभी थोड़ी दूर ही गए थे कि रास्ते में देखा, सड़क के किनारे उगी झाडिय़ों में छोटे-छोटे लाल-लाल बेर लगे हैं। चूहे के मुंह में पानी भर आया। कौए से कहने लगा, भाई, मैं तो बेर खाऊंगा।
कौए ने मना किया, इन झाडिय़ों में बेरों के साथ कांटे भी लगे हैं। बेर तोड़ते समय तुम्हें कोई कांटा लग गया, तो बहुत दर्द होगा। मैं तोड़ देता हूं लेकिन चूहा नहीं माना। दोनों अपने तरीकों से बेर खाने लगे। कौआ उड़ता और चोंच में दबाकर बेर खाता। फिर से दूसरे बेर पर पहुंच जाता लेकिन चूहे को बार-बार झाड़ी पर चढऩा पड़ता। इसी चक्कर में चूहे के शरीर में कांटा चुभ गया। उसने पुकारा-भाई, कांटा चुभ गया।
कौए ने कांटा तो निकाल दिया मगर यह भी कहा-खबरदार, आगे से किसी बात की जिद्द मत करना। थोड़ी दूर जाने पर उन्होंने देखा, एक बैलगाड़ी जा रही है। चूहा कहने लगा भाई, मैं तो बैलगाड़ी में बैठकर चड्ढी खाऊंगा। कौए ने मना किया, पहिए के नीचे आ गया, तो कचूमर निकल जाएगा। मेरी पीठ पर बैठ जा। चड्ढी खिला दूंगा।
लेकिन चूहा फिर नहीं माना। बैलगाड़ी में बैठने की जिद्द करने लगा। कौआ हारकर बोला, ठीक है, जो मन में आए करो। वह तो उड़कर बैलगाड़ी में जा बैठा लेकिन चूहा कैसे उड़ता ? वह बैलगाड़ी के पहिए पर चढऩे लगा। तभी उसका पैर फिसला और वह पहिए में फंस गया। रोने लगा। शोर मचाने लगा, भाई, मुझे निकाल दो। मैं फंस गया हूं।
कौए ने चूहे को फिर निकाल दिया। बोला-तू एकदम मूर्ख है। मेरे अनुभवों से कुछ नहीं सीखता। कुछ समय बाद वे नदी पहुंच गए। कौए ने चूहे को समझाया-देख, ज्यादा आगे जाकर मत नहाना। फिसलन बहुत है। पानी भी बहुत गहरा है। इतना कह कौआ तो उड़ा और बीच नदी में जाकर गोता लगाने लगा।
चूहा बेचारा किनारे ही रह गया। सोचने लगा, 'मेरे को तो मना कर दिया, फिसलन है, पानी गहरा है और खुद बीच नदी में नहा रहा है। मैं भी वहीं नहाऊंगा।' वह अभी किनारे से कुछ आगे ही पहुंचा था कि तेज धार में बहने लगा। चूहा चिल्लाने लगा, भाई, मुझे निकालो। मैं डूब रहा हूं।
कौए को जिस बात का पहले ही डर था। जैसे ही उसने चूहे की आवाज सुनी, फौरन उसे पूंछ से पकड़ बाहर निकाल लिया और इस बार चूहे को खूब डांटा भी। चूहा चुपचाप सुनता रहा। नदी स्नान करके दोनों घर को चल पड़े। रास्ते में चूहे ने कौए से झगड़ा कर लिया। कहने लगा, तुमने मेरा किया ही क्या है? मैं सारे दिन बिल में मरता रहता हूं। तुम तो उड़ते-फुदकते फिरते हो।
नदी जाते समय मैंने तुझे कांटों से निकाला-कौए ने समझाया।
मैं तो वहां अपने कान छिदवा रहा था-चूहे ने कहा।
मैंने तुझे बैलगाड़ी के पहिए के नीचे से निकाला-कौए ने फिर कहा।
मैं तो उससे अपनी कमर दबवा रहा था चूहे ने जवाब दिया।
तुम डूब रहे थे तो मैंने तुम्हें निकाला-कौए ने कहा।
मैं तो गोते लगा-लगाकर नहा रहा था-चूहे ने कहा।
कौए ने सोचा, 'जो समझाने से भी नहीं समझता, ऐसे से बहस करना बेकार है, और वह उड़ गया। चूहा अकेला रह गया।
-नरेन्द्र देवांगन

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