बच्चों की समस्याओं को समझिए

बच्चों की समस्याओं को समझिए

संसार में बच्चे अमूल्य निधि हैं। बच्चों का अपना संसार होता है जिसमें घुस कर ही हम उनकी भावनाओं व संवेदनाओं को पहचान पाते हैं। बच्चों की छोटी-छोटी बातें जिनकी हम उपेक्षा करते हैं उनके लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती हैं वह क्या चाह रहा है, क्या सोच रहा है क्या कर रहा है, यदि आप इसे देखेंगे तो पाएंगे कि वह अपनी ही दुनियां में कितना मस्त रहता है।
नन्हें-मुन्नों की दुनिया में भी कितनी हलचल, कितनी उठा पटक होती है, इसका तो हमें अन्दाजा भी नहीं होता। कोई आ रहा है। कोई जा रहा है, आप यह सोचते हैं कि उस पर किसी बात का तो प्रभाव नहीं पड़ रहा है जबकि ऐसा नहीं है। अपनी शैशवावस्था से लेकर स्कूल जाने के दिनों तक वह काफी कुछ देख-सुन कर अपनी बाल-बुद्धि से समझ चुका होता है और उसकी कई बातें हमें उसकी तर्क-शक्ति की झलक भी दिखाते हैं, ऐसे में बच्चों को पूर्णतय: नासमझ जानकर उपेक्षा करना कहां तक उचित है।
अक्सर नन्हें से बच्चे को अनदेखा करके माता पिता वक्त-बेवक्त उसके सामने लडऩे-झगडऩे लगते हैं। अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए अनेक तरह की गलत तरकीबें करके उस मासूम के स्वच्छ दिमाग में गलत बातों को आरोपित करते हैं। जिन परिवारों में छोटी-छोटी बातों पर माता पिता या घर के अन्य सदस्यों के मध्य तकरार होती है, उन समस्त अप्रिय बातों से बच्चे का कोमल मन-मस्तिष्क सहम जाता है।
जहां पिता या घर का पुरूष शराब पीकर अनर्गल प्रलाप करता हो और मां हमेशा रोती-कलपती तथा अपने भाग्य को कोसती हो, वहां बच्चा जो कुछ अनुभव करता होगा, हम उसकी कल्पना नहीं कर सकते, क्योंकि बच्चा वह सब किसी से कह नहीं पाता पर जो संस्कार पड़ जाते हैं, वे पक्के होते चले जाते हैं।
नन्हे की मुश्किलें समझिए
नन्हा नासमझ बच्चा अपनी बात बता नहीं सकता। वह स्वयं को पूरी तरह से व्यक्त भी नहीं कर पाता। अभिभावक उसकी मुश्किलों को समझने की बजाए उसे मारते-पीटते व कोसते हैं। यह कहां तक उचित है। बच्चे को आपने कुछ खाने को दिया, यदि नहीं खाता तो उस पर भी उसे डांट पड़ती है। यदि वह खेलने जाना चाहता है, खेलने नहीं देते, तब भी वह मन मसोसकर रह जाता है।
रातदिन की मारपीट व गाली-गलौज से बच्चा किसी काम का नहीं रह जाता। वह विद्रोही होकर जाने कैसी-कैसी हरकतें करने लगता है। बार बार डांट-फटकार भी उसे निर्लज्ज बना देती है। बच्चों को इतना सबक प्रारम्भ से ही सिखाएं कि आपके आंख दिखा देने भर से वह उस कार्य को न करे जो वह करना चाहता है किन्तु आप नहीं चाहते कि वह ऐसे गलत या गन्दे कार्य करे।
फिर भी हमेशा भयभीत रखना कोई अच्छी बात नहीं होगी। बच्चा जिद पर अड़ जाए तो उसे समझाइए, उसकी कठिनाइयों पर गौर करिए। पढ़ाई में भी मदद करें। मात्र ट्यूशन लगाना काफी नहीं। उसकी भाषा व व्याकरण संबधी मुश्किलों का हल आप उसे इन विषयों को पढ़ा कर व समझा कर ही दूर कर सकते हैं। अंग्रेजी माध्यम में बच्चा दोहरी मार खाता है, घर की भी व बाहर की भी। अंग्रेजी भाषा की किताबें व शब्दकोश लाकर दीजिए।
कोमल हृदय की मासूम अनुभूतियों को महसूस करिए, अपना लाड़ प्यार व समय भी उसे दीजिए। तभी आप अपने नन्हें से बातें करके उसकी समस्या को पहचान सकेंगे।
-जोगेश्वरी सधीर

Share it
Share it
Share it
Top