महाभारत कथा: धृतराष्ट्र और हंस के बच्चे

महाभारत कथा: धृतराष्ट्र और हंस के बच्चे

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। कौरव अपनी जान खो बैठे थे। जिंदा थे तो केवल कौरवों के पिता धृतराष्ट्र। वे पांडवों के पास ही रहते थे। पांचों भाई उनकी पिता तुल्य सेवा करते थे। पांडव उन्हें अच्छा खिलाते-पिलाते, पर भोजन के बाद भीम उनसे रोज एक कटु वाक्य कहते, सौ को खा गये, अब भी तुम्हारा पेट नहीं भरा।
धृतराष्ट्र जहर का घूंट पी कर रह जाते। उनके तन बदन में आग लग जाती। उनका खाया-पिया जहर हो जाता परंतु वे उसके जवाब में कुछ नहीं बोलते। मन ही मन कुढ़ते रहते। एक दिन श्री कृष्ण उनसे मिलने आये और पूछा 'धृतराष्ट्र कहो क्या हाल है?'
धृतराष्ट्र बोले 'प्रसन्न हूं महाराज! केवल एक वेदना है। पांडव मुझे अच्छा खिलाते पिलाते हैं परंतु भोजन के बाद रोज भीम मुझसे एक कटु वाक्य कहता है कि सौ खा गए अब भी तुम्हारा पेट नहीं भरा। बस मेरा खाया-पिया जहर हो जाता है।'
श्री कृष्ण के सांवले मुख पर मुस्कान फैल गई। उन्होंने धृतराष्ट्र के कंधे पर हाथ रख कर कहा, 'इस वाक्य में तुम्हारे पूर्वजन्म की एक कहानी छुपी हुई है धृतराष्ट्र!'
'कहानी! कैसी कहानी' धृतराष्ट्र ने धीरे से पूछा।
'क्या तुम सुनना चाहते हो?'
'अवश्य, उससे शायद मेरे मन की पीड़ा कम हो सके।आप सुनाइए।'
'तो सुनो धृतराष्ट्र।' श्री कृष्ण ने कहना शुरू किया, 'तुम पिछले सौ जन्मों से राज पद प्राप्त करते आ रहे हो। इस जन्म से पहले भी तुम एक बहुत अच्छे धर्मात्मा और दानी राजा थे। तुम दुखियों की सहायता करते थे, जनता की परेशानी को अपनी परेशानी समझते थे पर दुर्भाग्य, तुम कोढ़ की बीमारी से परेशान थे। कोढ़ तुम्हें कभी सुख की नींद नहीं सोने देता था। एक बार ऐसा हुआ कि मानसरोवर झील सूख गई। उसमें रहने वाले हंसों के सामने अपने जीवन की समस्या आ गई। इसलिए उन्होंने मानसरोवर को छोडऩे का निश्चय कर लिया। वे अपने अपने बच्चों को साथ ले दक्षिण दिशा की ओर उड़ चले। रास्ते में तुम्हारा राज्य पड़ता था। वे सब के सब तुम्हारे राज्य में उतर आए। तुमने उनका मूल्यवान मोतियों के थैलों से आतिथ्य किया जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया। जब तुमने उनसे उनके दक्षिण दिशा जाने का कारण पूछा तो उन्होंने मानसरोवर के सूख जाने की बात बता कर कहा कि हम सब दक्षिण की ओर जा रहे हैं, इसलिए आप हमारे इन सौ बच्चों को पालें। जब वर्षा हो जाएगी और मानसरोवर भर जाएगा, तब हम वापिस आएंगे और अपने बच्चों को ले जाएंगे। इस जिम्मेदारी को तुमने सहर्ष स्वीकार कर लिया और उनको पालने का काम अपने एक माली को दे दिया।
उधर तुम्हारा यह हाल था कि जब तक तुम्हारे खाने के थाल में मांस नहीं होता था, तुम खाना नहीं खाते थे। एक दिन तुम्हारा रसोइया तुम्हारे लिए मांस का इंतजाम नहीं कर सका। वह जल्दी में उस माली के पास गया और बोला' माली आज महाराज के लिए मांस का इंतजाम न हो सका, इसलिए इन हंसों में से एक हंस मुझे दे दो।' माली भला क्यों नहीं देता।
रसोइये ने हंस का मांस बनाया। जिस दिन तुमने वो मांस खाया, तुम्हारे कोढ़ में आराम रहा, जलन में कमी रही और न्नव भी कम हुआ। तुम्हें बहुत खुशी हुई। तुमने रसोइये से कहा, आज का मांस से मुझे काफी आराम मिला, तू रोजाना मेरे लिए यही मांस बनाया कर।' तुम्हारे कोढ़ में हंस के मांस से लाभ पहुंचा व रोग शांत होने लगा और धीरे धीरे तुम पूरी तरह स्वस्थ हो गए लेकिन तब तक तुम हंसों के सारे के सारे बच्चों को खा चुके थे।
वर्षा हुई। हंस वापस लौटे। वे तुम्हारे राज्य में रूके। तुमने उनका फिर बहुत अच्छा आतिथ्य किया। जब वे जाने लगे तो बोले 'महाराज हमारे बच्चों को बुला दीजिए, हम उन्हें वापिस ले जाना चाहते है।' तुमने माली को बुला कर हंसों के बच्चों के बारे में पूछा तो वह बोला, 'महाराज मुझे तो मालूम नहीं, अपने रसोइये से मालूम कीजिए। रसोइये को बुलाकर हंस के बच्चों के संबंध में पूछा तो वह बोला,'अब मैं कहां से लाऊं श्रीमान, वे तो सब के सब आपके पेट में पहुंच चुके हैं। उसी की बदौलत आपके कोढ़ का भयंकर रोग मिटा है।
यह सुनते ही तुम असमंजस में पड़ गए। उधर हंसों की आत्मा बच्चे के वियोग में कराह उठी। जब तुम कुछ भी उत्तर न दे सके तो वे हंस बोले ' जा हम तुम्हें यह श्राप देते हैं कि तेरे ही बेटों के रूप में हमारे सारे बच्चों जन्म लेंगे और हममें से एक तेरे परिवार के अन्य सदस्य के घर जन्म लेगा, जो महा पराक्रमशाली होगा।
इसलिए धृतराष्ट्र जो सौ पुत्र तुम्हारे थे, वे सब उन हंसों के बच्चे थे। जो यह भीम है, यह उन हंसों में से एक है। इसे अभी भी तुम्हारे पूर्व जन्म की कहानी याद है। तुम तो भूल गए और इसी कारण यह भीम तुम्हारे ।दय को छेदता रहता है और उसी पाप की वजह से तुम जन्मजात अंधे हुए हो।'
श्री कृष्ण ने कहानी समाप्त की और धृतराष्ट्र को झिंझोड़ा। वह चौंक कर उठ खड़ा हुआ और एक ओर चल दिया। अपने पाप के भार से उसके पैर बोझिल हो गए थे। वे उससे उठाए भी उठ नहीं रहे थे।
- गुरिन्द्र भरतगढिय़ा

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