बाल जगत: हमारे पर्व-त्योहार किसी विशिष्ट तिथि को ही क्यों होते हैं

बाल जगत: हमारे पर्व-त्योहार किसी विशिष्ट तिथि को ही क्यों होते हैं

हमारे पर्व-त्योहार हिन्दी तिथियों के अनुसार ही होते हैं जिसका निर्णय हम पंचांग से करते हैं किंतु कोई पर्व-त्योहार किसी विशेष तिथि को ही क्यों होता है, इसके पीछे एक विशेष कारण है। पर्व-त्योहारों में किसी विशेष देवता की पूजा की जाती है, अत: स्वाभाविक है कि वे जिस तिथि के अधिपति हों, उसी तिथि में उनकी पूजा हो। यही कारण है कि उस विशेष तिथि को ही उस विशिष्ट देवता की पूजा की जाए।

प्रतिपदा: अग्नि आदि देवों का उत्थान पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को होता है। अग्नि से संबंधित कुछ और विशेष पर्व प्रतिपदा को ही होते हैं।

द्वितीया: प्रजापति का व्रत प्रजापति द्वितीया इसी तिथि को होता है।

तृतीया: चूंकि गौरी इसकी स्वामिनी हैं, अत: उनका सबसे महत्त्वपूर्ण व्रत हरितालिका तीज भाद्र शुक्ल पक्ष को तृतीया को ही महिलाएं करती हैं।

चतुथीर्: गणेश या विनायक चतुर्थी सर्वत्र विख्यात है, यह इसलिए चतुर्थी को ही होती है, क्योंकि चतुर्थी के देवता गणेश हैं।

पंचमी: पंचमी के देवता नाग हैं, अत: श्रावण में कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की दोनों चतुर्थी को नागों तथा मनसा (नागों की माता) की पूजा होती है, जिसे नागपंचमी कहते हैं।

षष्ठी: स्वामी कार्तिक की पूजा षष्ठी को होती है, क्योंकि इसके स्वामी कार्तिक ही हैं।

सप्तमी: देश-विदेश में मनाया जाने वाला सर्वप्रिय त्योहार प्रतिहार षष्ठी व्रत(डालाछठ) यद्यपि षष्ठी और सप्तमी दोनों दिन मनाया जाता है किंतु इसकी प्रधान पूजा(और उदयकालीन सूर्य अर्घ दान) सप्तमी में ही किया जाता है। छठ पर्व के निर्णय में सप्तमी प्रधान होती है और षष्ठी गौण।

यहां ज्ञातव्य है कि सप्तमी के देवता सूर्य हैं। वस्तुत: सायंकालीन अर्घ्य में हम सूर्य के तेजपुंज(सविता) की आराधना करते हैं, जिन्हें 'छठमाई' के नाम से संबोधित करके उन्हें प्रात:कालीन अर्घ्य ग्रहण करने के लिए निमंत्रित किया जाता है। जिसे ग्रामीण अंचलों में 'न्योतन' कहा जाता है। पुन: प्रात:कालिक सूर्य को 'दीनानाथ' से संबोधित किया जाता है।

यहां ध्यातव्य है कि एक ही सूर्य के दो रूपों की पूजा सायं और प्रात: होती है, किंतु सायंकाल में दीनानाथ नहीं वरन 'छठमाई' कहा जाता है, जबकि प्रात:काल में छठमाई नहीं वरन दीनानाथ या सूरजदेव ही कहा जाता है।

अष्टमी: यद्यपि अष्टमी के देवता शिव हैं किंतु मतांतर से सच्चिदानंद पारब्रम्ह शिव ज्ञात होता है। क्योंकि अष्टमी को शिव की बजाय बहुत से देवी-देवताओं की पूजा होती है, अत: शिव को व्यापक रूप में मानकर इनके परिणामस्वरूप देवी-देवताओं की पूजा मानना ही तर्कसंगत होगा। अष्टमी के पर्व जैसे कालभैरव अष्टमी, दुर्गा अष्टमी, शीतला अष्टमी, कृष्णा अष्टमी, राधा अष्टमी इत्यादि। इसके अतिरिक्त अपूपाष्टका और अन्वष्टका भी अष्टमी को ही विहित है।

नवमी: नवमी की स्वामिनी दुर्गा ही है, अत: दुर्गा का महान पर्व नवरात्र एवं महानवमी नवमी को ही संपन्न होता है।

दशमी: इसके अधिपति यमराज हैं, अत: इनकी पूजा दशमी को विहित है। जहां तक यम द्वितीया का प्रश्न है तो वह विशेषकर चित्रगुप्त पूजा का दिन है और भ्रातृ द्वितीया का। वास्तव में वह भ्रातृ पूजा का दिन है, क्योंकि उस दिन यमराज की बजाय भाई की पूजा की जाती है। और भगिनी(बहन) के यहां भोजन किया जाता है। यमराज वस्तुत: इसमें प्रतीक रूप से जुड़े हैं क्योंकि यमुना ने उनकी पूजा भ्रातृ रूप में की थी।

एकादशी : एकादशी के स्वामी विश्वेदेव (विष्णु का विराट रूप) हैं, अत: उनकी पूजा एकादशी को होती है, यह सर्वविदित है।

द्वादशी : द्वादशी के अधिपति भी विष्णु हैं किंतु इसमें उनके विभिन्न अवतारों के रूपों में पूजा होती है। जैसे वामन द्वादशी, नृसिंह द्वादशी आदि।

त्रयोदशी : त्रयोदशी के वैसे स्वामी तो कामदेव हैं, किंतु उनके नष्ट हो जाने और उन पर विजयी होने के कारण शिव को कामेश भी कहा जाता है और संभवत: इसी कारण त्रयोदशी को प्रदोष एवं शिवरात्रि व्रत होता है जो शिव की प्रधान पूजा है।

चतुर्दशी : चतुर्दशी का अधिपति यद्यपि शिव को माना गया है किंतु इस तिथि को भी विविध देवताओं की पूजा होती है जैसे महालक्ष्मी, महाकाली, शिव-पार्वती, नृसिंहादि चतुर्दशी, वैकुंठ चतुर्दशी, हनुमत चतुर्दशी आदि किंतु शिव पूजा के लिए चतुर्दशी को सर्वाधिक उपयुक्त माना है।

अमावस्या, पूर्णिमा: अमावस्या और पूर्णिमा का कारण चंद्रमा का उदय न होना और होना ही है। अत: अमावस्या-पूर्णिमा, चंद्रमा और चंद्रलोकवासी पितरों की पूजा के लिए सर्वाधिक उपयुक्त मानी जाती है।

इस प्रकार पता चलता है कि हमारे किसी भी पर्व-त्योहार की परंपरा के पीछे एक ठोस और प्रामाणिक कारण हैं, जिसके कारण वे आज भी उतने ही सार्वकालिक और सार्वभौम हैं जितने शताब्दियों पूर्व थे।

- नरेश सिंह नयाल

Share it
Top