बाल जगत/जानकारी: गंगा प्रदूषण की कहानी-गंगा की जुबानी

बाल जगत/जानकारी: गंगा प्रदूषण की कहानी-गंगा की जुबानी

मैं आपकी पतित पावनी 'गंगा' बहुत दुखी हूूं। मेरा अमृतमय पानी प्रदूषित होकर विषाक्त हो गया है। वह पीने लायक भी नहीं रह गया है। उसमें जो औषधिकारक गुण था, वह धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। मैं बीमारियों का घर बन गयी हूं।

मेरे पानी के सेवन से अनेक लोगों को हानि पहुंच सकती है। इन सब कारण से मैं बहुत दुखी हूं। मैं इस मृत्यु लोक में भगीरथी की कठिन तपस्या के कारण इस मरुभूमि को शुद्ध करने आयी थी लेकिन यहां के निवासियों को शुद्ध करते-करते मैं खुद ही अशुद्ध हो गयी हूं।

आज स्थिति यह हो गयी है कि मुझे शुद्ध करने हेतु एक राष्ट्रीय स्तर पर अभियान चलाया जा रहा है। एक 'गंगा विकास प्राधिकरण' की स्थापना की गयी है जिसका उद्देश्य गंगा को प्रदूषण से मुक्त करना है। इस कार्य के लिए करोड़ों रुपये खर्च किये जा रहे हैं। मेरी इस दुर्दशा के लिए बहुत से लोग दोषी हैं जिनमें मेरे भक्त भी बड़ी संख्या में शामिल हैं।

मेरा उदय हिमालय के पास गंगोत्री से हुआ है। बहुत दिनों से हिमालय के पास वनों की अंधाधुंध कटाई की जाती रही है जिसके कारण पहाड़ी क्षेत्रों में बाढ़ आती है। उस बाढ़ से पेड़ों का मलवा बहकर नदी में जम जाता है। इस प्रकार जिस जगह से प्रारंभ होकर मैं सारे देश में बहती हूं, वहीं से मुझमें गंदगी समा जाती हैं।

मैं 'गंगोत्री' से ही प्रदूषणयुक्त हो जाती हूूं। इसके बाद मैं 'नीलधारा' में नहरों के रूप में बहती हूूं। नहर के रूप में बहने के कारण मुझमें गंदगी छानने की प्राकृतिक क्षमता खत्म हो जाती है। गंदगी मेरी तलहटी में जमा हो जाती है। इस तरह से पूरे देश में अपने में गंदगी समाये बहने लगती हूं।

मैं अनेक नगरों में बहती हूं। मेरे तट पर लगभग 114 शहर बसे हुए हैं जिनमें 48 प्रथम श्रेणी के तथा 66 द्वितीय श्रेणी के नगर हैं। इन सब नगरों की गंदी नालियों का दूषित जल मुझमें बड़े व छोटे नालों द्वारा गिराया जाता है। आपको मेरी दुर्दशा का अंदाजा इसी से हो जायेगा कि मुझमें गिरने वाले नदी-नालों की संख्या 16 हजार हो गयी है जिसमें गंगोत्री से वाराणसी तक ही 16111 गंदगी युक्त छोटे-बड़े नदी-नाले मुझमें गिरते हैं। इतने ज्यादा नदी-नालों की गंदगी ने मुझे प्रदूषित कर दिया है।

मेरे तट पर बसा हुआ कानपुर एक बहुत बड़ा औद्योगिक नगर है जो अपने चमड़ा उद्योग के लिए जग प्रसिद्व है। मुझमें लगभग 60 बड़े चर्म उद्योग कारखानों का कचरा आकर मिलता है। इस कचरे में क्रोमियम धातु की अधिकता रहती है।

जिसके कारण मेरा पानी दुर्गन्धयुक्त हो जाता है। उसमें कैंसर तथा चर्म रोग के जीवाणु पनपने लगते हैं। मेरे पानी को तो कानपुर के चमड़ा उद्योग ने एकदम विषाक्त कर दिया है। आज मेरा यह हाल हो गया है कि जहां मैं पहले स्वास्थ्य लाभ पहंचाती थी, आज वही हानिकारक सिद्ध हो रही हं। पूरे देश में मेरे किनारे बसे हुए लगभग पांच हजार छोटे-बड़े उद्योग अपना रसायनिक पदार्थों युक्त कचरा मुझ में बहाते हैं। इन उद्योगों में मात्र 1966 के पास प्रदूषण के संयंत्र हैं, शेष सब उद्योग मुझे प्रदूषित कर रहे हैं।

अपने पापों को धोने के लिए लाखों रोज मुझ में स्नान करते हैं। मुझे भगवान की तरह पूजते हैं। इसके साथ ही मेरे किनारे पर मल-मूत्र का त्याग कर मुझे दूषित भी करते हैं। और तो और, मुझमें सारे शहर का मलयुक्त पानी भी बहा देते हैं। अकेले बाबा शिव की नगरी बनारस में मुझमें 20 करोड़ गैलन मलयुक्त पानी गिराया जाता है।

मेरे तट पर मनुष्य की लाशें जलाई जाती है। सारी गंदगी आकर मुझमें मिल जाती है। प्रतिवर्ष तीस हजार लाशें मेरे किनारे पर जलाई जाती है या बहा दी जाती है। पहले मुझमें घडिय़ाल, कछुए, मगरमच्छ, मछलियां आदि सारी गंदगी चाट जाते थे लेकिन जब से इनका सफाया कर दिया गया है, मैं अकेली रह गयी हूं।

मुझमें फेंके मुर्दें या जानवर बुरी तरह सड़ जाते हैं और गिद्ध या कुत्ते आदि मेरे चारों ओर गंदगी फैलाते रहते हैं। मछुआरे मुझसे मछली लेकर अपना पेट पालते हैं मगर वे भी अपनी सारी गंदगी मुझमें ही डालकर मुझे प्रदूषित कर रहे हैं। धोबी भी मुझमें अपनी सारी मैल डाल जाते हैं।

मुझ में 70 हजार तीर्थयात्री प्रतिदिन अकेले बनारस में डुबकी लगाकर न जाने क्या-क्या बीमारियां छोड़ जाते हैं। मैं पाप धोने वाली गंगा अब गंदगी धोने वाली गंगा बन गयी हूं।

सारे देश के लोगों ने मुझे प्रदूषित कर रखा है। सबसे ज्यादा 33 प्रतिशत मुझे उत्तर प्रदेश के लोगों ने दूषित कर रखा है। इसके बाद पश्चिम बंगाल ने 27 प्रतिशत, बिहार ने 20 प्रतिशत प्रदूषित किया है।

मेरी व्यथा सुनकर आज आप ही नहीं बल्कि सरकार भी द्रवित है जो मुझे प्रदूषण मुक्त करने के लिए जोर-शोर से अभियान चला रही है।

आप यह सोच रहे होंगे कि पवित्रता की देवी, पाप हरने वाली, भारत की आत्मा 'गंगा' खुद क्यों प्रदूषित हो गयी तो इसका सीधा सा कारण है कि लोग मुझमें पाप धोने की बजाये अपनी गंदगी धोने में लग गये हैं।

आज मैं कितनी दुखी हूं, इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तो लोग मुझे 'गंगा तेरा पानी अमृत' कहकर सम्मान देते थे, वही आज मुझे 'राम तेरी गंगा मैलीÓ कहकर मेरा मजाक उड़ा रहे हैं।

- उमेश कुमार गुप्ता

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