इनसे भी सीखो: नन्हे-मुन्ने गिरते बच्चे

इनसे भी सीखो: नन्हे-मुन्ने गिरते बच्चे

ये नन्हे-मुन्ने हैं। गिरते हैं, पड़ते हैं, झगड़ते हैं पर अगले ही पल संभलते हैं, उठकर चलते हैं तथा एक होकर फिर से संग-संग खेलने लगते हैं। यह इनका बचपना है पर ऐसा महसूस होता है जैसे न जाने कितने परिपक्व इंसान में तब्दील हो चुके हैं। यदि एक बच्चा खेलते-खेलते गिर जाता है तो वह उठकर बिना किसी बात की परवाह किए हुए फिर से अपने साथियों के साथ खेलने लगता है। यह तो हम सभी जानते हैं और सभी ने इस बात पर गौर किया होगा परन्तु कभी इसके दूसरे पक्ष पर गौर फर्माया है।
जब बच्चा गिरता है तो वह अपने आसपास वालों पर नजर डालता है। यदि कोई देख रहा होता है तो वह रोना शुरू कर देता है वरना कितनी भी चोट लगी हो, वह पहले स्वयं ही उठने का प्रयास करता है अर्थात जिस पल उसने दुनियांवालों की परवाह की और यह मन में डाल लिया कि लोग क्या कहेंगे या क्या सोच रहे होंगे तो उसका मनोबल टूटता है और ठहाके उसे शर्मिंदगी का मोहरा मात्र बनाकर रख देते हैं। उस गिरे हुए बच्चे की यह समझ में भी नहीं आता कि अब वह क्या करे और ये दुनियांवाले उस पर क्यों हंस रहे हैं।
अर्थात् हमें भी अपने जीवन में अपने कृत्यों को पूरी कर्मठता से करते चले जाना चाहिए फिर चाहे यह जमाना कुछ भी कहता और करता रहे। मंजिल मिलने से पहले ठहरने का विचार भी मन में नहीं लाना चाहिए तथा हौसलों को बुलंद कर लेना चाहिए।
ये बच्चे हमें सीख देते हैं कि दुनियां तो कहती ही रहती है। हमें तो बस अपने लक्ष्य की तरफ स्वयं मेहनत करके बढ़ते चले जाना चाहिए। जिस दिन सफलता मिल जायेगी, ये दुनियां वाले उस दिन खुद ब खुद हमारे साथ होते चले जाएंगे।
- नरेश सिंह नयाल 'राज'

Share it
Top