नि:स्वार्थ मेहनत और त्याग का परिणाम दादा साहब फाल्के

नि:स्वार्थ मेहनत और त्याग का परिणाम दादा साहब फाल्के

आज के दौर में हम जिस तरह से, एक से बढ़कर एक शानदार फिल्मों का प्रदर्शन देख रहे हैं, असल में यह उस जनून का हिस्सा है जो भारतीय फिल्म उद्योग के पितामह दादा साहेब फाल्के ने देखा था। दादा साहेब फाल्के फिल्मों के इतने शौकीन थे कि वे फिल्म निर्माण के प्रशिक्षण लेने के लिए विदेश गये। वहाँ से फिल्म निर्माण की पूरी तकनीक सीखकर देश वापस आये और शुरू हो गया भारत की पहली फिल्म निर्माण का काम। आज हमें नई-नई तकनीक की फिल्में देखने का मौका मिल रहा है, यह दादा साहेब फाल्के के फिल्मों के प्रति जनून और कामयाब कोशिश का ही नतीजा है। बताया जाता है कि भारतीय सिनेजगत की पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र के निर्माण की योजना बनाई गई, तब लगभग पांच सौ लोगों की टीम ने भागीदारी निभाई। इन पांच सौ लोगों के कपड़े (कास्टयूम) और भोजन की व्यवस्था स्वयं दादा साहेब ने की थी। इन पांच सौ लोगों के कपड़े दादा साहेब की पत्नी स्वयं धोती थी और इतने ही लोगों का भोजन भी वह स्वयं तैयार करती थीं। दादा साहेब फाल्के जिस तरह से फिल्मों के प्रति समर्पित थे, उन्हें परिवार का भरपूर सहयोग भी मिला। जब फिल्म निर्माण की योजना बनी, तैयारी पूरी हुई, अब जरुरत धन की ? कहां से आयेंगे पैसे। तब दादा साहेब की पत्नी ने अपने गहने-जेवर बेचने के लिए स्वयं दादा साहेब को दे दिये जिनसे उन्हें पन्द्रह हजार रुपये मिले। और फिल्म की कुल लागत पैंतीस हजार रुपये थीं जिसमें यह सहयोग बहुत ही कारगर साबित हुआ। सभी के त्याग और दादा साहेब की मेहनत से जन्म लिया भारत की पहली फिल्में और आज भारतीय फिल्म उद्योग विश्व के सर्वाधिक फिल्म निर्माण करने वाले देशों के श्रेणी में आ गया है।
-घनश्याम जी, वैष्णव बैरागी

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