उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी के साथ स्थानीय भाषा की वकालत

उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी के साथ स्थानीय भाषा की वकालत


नई दिल्ली। कानूनविदों और बुद्धिजीवियों ने देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी के साथ-साथ स्थानीय भाषाओं के इस्तेमाल की वकालत करते हुए कहा है कि प्रत्येक भारतीय को अपनी भाषा में न्याय पाने का अधिकार है। विद्वानों ने चिंता जताते हुए कहा कि आखिर क्या कारण है कि भारत में शीर्ष न्यायालयों की भाषा कोई भारतीय भाषा न होकर, जनता की भाषा न होकर अंग्रेजी है।
भारतीय भाषा अभियान और शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास द्वारा संयुक्त रूप से यहां आयोजित तीन दिवसीय 'ज्ञानोत्सव-2075' में 'जनता को जनता की भाषा में मिले न्याय' विषय पर आयोजित संगोष्ठी में विभिन्न शीर्ष न्यायालयों के वर्तमान, निवर्तमान और भावी विद्वान न्यायमूर्तियों ने चर्चा की और इस दिशा में आगे बढ़ने का संकल्प लिया।
केरल के न्यायमूर्ति हरिहरन ने कहा कि न्यायालय में भारतीय भाषाओं को लागू करने में अधिक समस्या ऊंचे स्तर पर बैठे अधिकारियों और न्यायधीशों को होती है। इस पर उच्च न्यायलय को दखल देना चाहिए। उन्होंने कहा कि हर भारतीय को अपनी भाषा में न्याय पाने का अधिकार है और इसके अलावा वह आपसे कुछ मांग ही क्या रहा है।
न्यायमूर्ति प्रमोद के अनुसार, भारतीय भाषा के दो अंग होते हैं पहला श्रवण और दूसरा लिपि। हमारे देश में 652 भाषाएं और बोलियां हैं। ये भाषाएं देश की विविधता का प्रतीक है और इनकी लिपि देश की एकता का प्रतीक है।
शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव अतुल कोठारी ने शनिवार को संवाददाता सम्मेलन में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 348-1 में कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय की बार काउंसिल में भाषा अंग्रेजी रहेगी। लेकिन 348-2 में कहा गया है कि यदि उस राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति को इस संबंध में प्रस्ताव भेजे और राष्ट्रपति उस पर हस्ताक्षर कर देते हैं, तो उस राज्य में अंग्रेजी के साथ-साथ हिन्दी अथवा वहां की स्थानीय (राज्य भाषा) का प्रयोग उच्च न्यायालय में किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि इसी प्रावधान के तहत बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान सहित चार राज्यों के उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी के साथ-साथ हिन्दी का प्रयोग किया जा रहा है। उन्होंने सवाल किया कि देश के शेष राज्यों में भी ऐसा क्यों नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि वह अंग्रेजी को हटाने की मांग नहीं कर रहे हैं बल्कि अंग्रेजी के साथ-साथ वहां की राज्य भाषा को जैसे गुजरात में अंग्रेजी के साथ गुजराती, केरल में अंग्रेजी के साथ-साथ मलयालम ।
कोठारी ने कहा अपनी भाषाओं में शीघ्रता से काम शुरू होना चाहिए। प्रत्येक भारतीय अपनी भाषा से प्यार करता है। मां, मातृभाषा और मातृभूमि कभी नही बदली जा सकती।

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