भरपूर पैदावार के लिए किसानों को साझी खेती की सलाह

भरपूर पैदावार के लिए किसानों को साझी खेती की सलाह

नई दिल्ली। कृषि राज्य मंत्री परषोत्तम रुपाला ने खेत के आकार में आ रही कमी पर चिन्ता व्यक्त करते हुए आज कहा कि गैर-सरकारी संगठन या सहकारिता समिति के माध्यम से साझी खेती की जानी चाहिये, जिससे बढती आबादी की जरूरतें पूरी का जा सकें। श्री रुपाला ने यहाँ गैर-सरकारी संगठनों के परिसंघ तथा कई अन्य संस्थाओं की ओर से कृषि पर आयोजित एक सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए कहा कि परिवारों के बँटवारे के कारण खेतों का आकार काफी छोटा होता जा रहा है और देश में 9० प्रतिशत छोटे एवं सीमांत किसान हो गये हैं। खेतों के टुकड़ों में बँटने के कारण मशीन से खेती का काम नहीं हो पा रहा है, जिससे किसानों को पूरा लाभ नहीं मिल रहा है। उन्होंने कहा कि गैर-सरकारी संगठन और सहकारी समितियाँ गाँवों के किसानों को संगठित कर साझी खेती करा सकती हैं, जिससे भरपूर पैदावार ली जा सकती है। इसके लिए एक माँडल तैयार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि काफी पहले गुजरात के एक गाँव में साझी खेती का प्रयोग किया गया था जो सफल भी रहा। लेकिन, उसके नेता के निधन के बाद यह बिखर गया था। कृषि मंत्री ने कहा कि सरकार की ओर से योजनाओं के क्रियान्वयन में कई बार काफी देर हो जााती है। कई बार तो परिपत्रों को जिला स्तर पर पहुँचने में तीन साल तक का समय लग जाता है। उन्होंने सुझाव दिया कि गैर-सरकारी संगठनों को कृषि मंत्रालय की एक योजना अपने हाथ में लेनी चाहिये। पूर्व केन्द्रीय मंत्री सोमपाल शास्त्री ने कहा कि हरित क्रांति पानी की उपलब्धता वाले क्षेत्रों तक सिमट कर रह गई है। आजादी के 7० साल बाद भी 6० प्रतिशत खेती वर्षा पर आधारित है। समय पर फसलों की सिंचाई नहीं होने से फसलों की पैदावार पर बहुत अधिक असर होता है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में प्रति हेक्टेयर 12 कुन्तल ही पैदावार होता है, जबकि सिंचाई की सुविधा (शेष पृष्ठ 2 पर)

मिलने पर पैदावार 4० कुन्तल प्रति हेक्टेयर तक पहुँच जाता है। उन्होंने कहा कि देश में 14.4 करोड़ हेक्टेयर जमीन में खेती की जाती है और इनमें यदि सिंचाई की सुविधा उपलब्ध करा दी जाये तो पैदावार 4० से 5० करोड़ टन फसलों की पैदावार हो सकती है। उन्होंने कहा कि इसके अलावा और भी जमीन है, जिस पर वृक्षारोपण किया जा सकता है, डेयरी केन्द्र स्थापित किये जा सकते हैं या पशुपालन किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि दुनिया में भारत अकेला देश है जहाँ पूरे साल फल-फूल और सब्जियों का उत्पादन लिया जाता है। श्री शास्त्री ने कहा कि पशुपालन से किसानों की आय में भारी वृद्धि की जा सकती है। देसी नस्ल की गायों में जलवायु परिवर्तन को सहन करने की क्षमता है और भीषण गर्मी को बर्दाश्त करने की क्षमता रखती है तथा उनमें रोग प्रतिरोधक गुण भी हैं। इन गायों से ए-2 दूध मिलता है, जो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। उन्होंने निर्यात में कृषि के योगदान की चर्चा करते हुये कहा कि देश के कुल निर्यात में कृषि का योगदान 12 से 14 प्रतिशत है, जबकि इमारती लकडिय़ों का आयात किया जाता है।

Share it
Top