समलैंगिकता मामले में सुप्रीमकोर्ट गुरुवार को फैसला सुनायेगा

समलैंगिकता मामले में सुप्रीमकोर्ट गुरुवार को फैसला सुनायेगा

नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय समलैंगिकता को अपराध करार देने संबंधी भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 की संवैधानिक वैधता का चुनौती देने वाली याचिका पर गुरुवार को फैसला सुनाएगा। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच-सदस्यीय संविधान पीठ इस मामले में नवतेज सिंह जोहार की अपील पर अपना फैसला सुनाएगी। संविधान पीठ में न्यायमूर्ति रोहिंगटन एफ. नरीमन, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा भी शामिल हैं। संविधान पीठ ने मामले की चार दिन लगातार सुनवाई करने के बाद गत 17 जुलाई को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। न्यायालय ने सुनवाई के दौरान कहा था कि अगर कोई कानून मौलिक अधिकारों का हनन करता है तो वह इस बात का इंत•ाार नहीं करेगा कि सरकार उसे रद्द करे। शीर्ष अदालत ने कहा था, अगर हम समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर भी करते हैं, तब भी किसी से जबरन समलैंगिक संबंध बनाना अपराध ही रहेगा। न्यायालय ने कहा था, नाज फाउंडेशन मामले में 2०13 के फैसले पर फिर से विचार करने की जरूरत है, क्योंकि हमें लगता है कि इसमें संवैधानिक मुद्दे जुड़े हुए हैं। दो वयस्कों के बीच शारीरिक संबंध क्या अपराध है, इस पर बहस जरूरी है। अपनी इच्छा से किसी को चुनने वालों को भय के माहौल में नहीं रहना चाहिए। उल्लेखनीय है कि यौनकर्मियों के कल्याण के लिए काम करने वाली संस्था नाज फाउंडेशन ने दिल्ली उच्च न्यायालय में यह कहते हुए इसकी संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया था कि अगर दो वयस्क आपसी सहमति से एकांत में अप्राकृतिक यौन संबंध बनाते हैं तो उसे अपराध की श्रेणी से बाहर किया जाना चाहिए। उच्च न्यायालय ने 2०19 में धारा 377 को निरस्त करते हुए अप्राकृतिक यौन संबंध को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था, लेकिन कुछ ही साल बाद शीर्ष अदालत ने 2०13 में उच्च न्यायालय के फैसले को पलटते हुए समलैंगिकता को फिर से अपराध घोषित कर दिया था। इस मामले में दोषी करार दिये जाने पर आरोपियों को 1० साल की सजा से लेकर उम्रकैद की सजा हो सकती है और यह गैर-जमानती भी है।

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