करोड़ों का पैकेज छोड़ लोगों के सपनों की उड़ानों को पंख लगाएगा पायलट

करोड़ों का पैकेज छोड़ लोगों के सपनों की उड़ानों को पंख लगाएगा पायलट


मुंबई। अमेरिका की बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विमानन क्षेत्र में नौकरी करने की तमन्ना हर एक पायलट की होती है, लेकिन अगर कोई पायलट अमेरिकी कंपनी की अच्छी-खासी नौकरी छोड़ समाज की सेवा शुरू करे तो लोगों को यह बात शायद हजम ही न हो। कैप्टन सत्यम ठाकुर (28) करोड़ों के पैकेज पर प्रतिष्ठित एयरलाइंस के पायलट की नौकरी छोड़ अमेरिका के ग्रीन कार्ड का मोह त्याग पालघर जिले की डहाणू तहसील के अपने पैतृक गांव वानगांव लौट आये हैं। अब उनका प्रयास है कि वह पालघर के ग्रामीण आदिवासी क्षेत्रो में मॉर्डन स्कूल और आधुनिक सुविधाओं से लैस अस्पताल बनाएं। इन स्कूलों में सिर्फ गरीबों के बच्चों को शिक्षा मिले। स्कूलों में व्यापारिक शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक विषयों की पढ़ाई होगी। यहां बच्चे रटेंगे नहीं, प्रत्यक्ष देखकर समझेंगे। मसलन, अगर तारामंडल पढ़ाया जा रहा है तो यह दूरबीनों से मौके पर ही दिखाया भी जाएगा। यहां बच्चों को अपने जीवन की दिशा तय करने की शिक्षा दी जाएगी ताकि वह अपने गांव में रहकर ही अपनी रुचि के अनुसार स्वावलंबी बनें।

कैप्टन सत्यम ठाकुर ने कहा कि वानगांव लौटने के बाद उन्होंने देखा कि ग्रामीण क्षेत्रो के लोग उपचार में देरी की वजह से समय से पहले मौत के मुंह मे समा रहे हैं। उनका कहना कि शिक्षा और स्वास्थ्य में सामानता होनी चाहिए जिस पर सभी को बराबर अधिकार मिलने चाहिए। आधुनिक अस्पताल बना उनमें एयर एम्बुलेंस की व्यवस्था सस्ती दरों पर करके किराया ईएमआई के रूप में लिया जाएगा। कैप्टन सत्यम ठाकुुुर का वानगांव से अमेरिका तक का सफर आसान नहीं था। डहाणू से 12वीं तक की शिक्षा को पूर्ण कर जब वह अपने पायलट बनने के सपने को पूरा करने के लिए अमेरिका गए तो वह पहली बार फ्लाइट में बैठे थे। अमेरिका के फ्लोरिडा शहर पहुंचकर तमाम मुश्किलों का सामना करने के बाद सिर्फ 19 वर्ष में सत्यम ठाकुर कॉमर्शियल (वाणिज्यिक) लाइसेंस पाने में सफ़ल हुए। पांच वर्षों तक वह अमेरिका की एक प्रतिष्ठित एयरलाइंस में कार्यरत रहे। फिर भारत लौटकर अपने पहले ही प्रयास में डीजीसीए की परीक्षा पास की और परीक्षा की तैयारी कर रहे ग्रामीण क्षेत्रों से आए पांच युवकों को पायलट बनने में मदत की जो आज इंडियन एयरलाइंस में बातौर पायलट कार्यरत हैं। इसके बाद सत्यम को आभास हुआ कि ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिभा की कमी नहीं है, बस फिर क्या था सत्यम ठाकुर का मकसद बदल गया। उन्होंने नौकरी छोड़कर लोगों के सपनों की उड़ा को पंख लगाने का फैसला किया। करोड़ो के पैकेज की नौकरी छोड़ने का फैसला सत्यम के लिए आसान नहीं था। पेशे से किसान उनके पिता ब्रिजेश ठाकुर ने उनको अपना पूरा सहयोग दिया।


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