विलय एवं अधिग्रहण सौदों में कम हो सरकारी नियंत्रण: साहू

विलय एवं अधिग्रहण सौदों में कम हो सरकारी नियंत्रण: साहू

नई दिल्ली। दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड (आईबीबीआई) के अध्यक्ष एम.एस. साहू ने विलय एवं अधिग्रहण सौदों की मंजूरी के लिए नियामक ढाँचे में बदलाव की माँग करते हुये आज कहा कि इनमें सरकार का नियंत्रण कम से कम हो तथा ऐसे फैसले कंपनियाँ बाजार कारकों के आधार पर करें। श्री साहू ने उद्योग संगठन एसोचैम द्वारा विलय एवं अधिग्रहण पर यहाँ आयोजित एक सम्मेलन में कहा हमें ऐसी परिस्थितियाँ तैयार करनी होंगी जहाँ फैसलें बाजार कारकों द्वारा प्रेरित हों, न कि सरकार करे। उन्होंने कहा कि विलय एवं अधिग्रहण के हर बड़े सौदे की मंजूरी के लिए नियामक के पास जाने की जरूरत नहीं होनी चाहिये क्योंकि हर मामले में बाजार पर उसका महत्वपूर्ण कुप्रभाव नहीं होता। आईबीबीआई अध्यक्ष ने कहा कि पिछले साल ऐसे 400 मामलों के लिए आवेदन किये गये जिनमें मात्र पाँच में यह पाया गया कि इसका बाजार पर महत्वपूर्ण कुप्रभाव पड़ सकता है। इसका मतलब यह है कि शेष 395 मामलों में नियामक के पास जाने की जरूरत नहीं थी। उन्होंने कहा कि अभी हम किसी सौदे के बाजार पर पडऩे वाले प्रभाव के आधार पर विचार नहीं करते। यदि उस सौदे में कंपनी का नियंत्रण प्रभावित रहा है तब हम उसमें बाजार नियंत्रण की स्थिति की संभावना पर विचार करते हैं और देखते हैं कि क्या इसका बाजार पर या प्रतिस्पद्र्धा पर कुप्रभाव पड़ सकता है। होना यह चाहिये कि कंपनी नियंत्रण की बजाय सीधे बाजार नियंत्रण को आधार बनाया जाना चाहिये। इससे विचारार्थ मामलों की संख्या कम हो जायेगी।
कॉरपोरेट मामले मंत्रालय में संयुक्त सचिव अमरदीप सिंह भाटिया ने कहा कि पिछले छह महीने से विलय एवं अधिग्रहण सौदों के मामले राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (एनसीएलटी) और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपील अधिकरण (एनसीएलएटी) के पास जाने लगे हैं। छह महीने का अनुभव अच्छा रहा है, लेकिन अभी इस प्रक्रिया में और सुधार की गुंजाइश है। उन्होंने बताया कि दोनों अधिकरणों की क्षमता बढ़ाने का भी प्रस्ताव है तथा आगामी कुछ महीनों में बेंचों की संख्या बढ़ाई जायेगी। विलय एवं अधिग्रहण पर एसोचैम के राष्ट्रीय परिषद के अध्यक्ष पवन कुमार विजय ने कहा कि दिवाला एवं शोधन अक्षमता कानून बनने के बाद अब विलय एवं अधिग्रहण सौदों की संख्या में तेजी से वृद्धि होगी। उन्होंने सरकार से दिल्ली और मुंबई में इन मामलों के लिए अगल बेंच बनाने की माँग की। उन्होंने कहा कि शोधन अक्षमता मामलों के निपटारे के लिए समय सीमा तय होने के कारण संयुक्त बेंचों में विलय एवं अधिग्रहण के मामलों के निपटारे में देरी होती है। सूचीबद्ध कंपनियों के लिए ऐसे मामलों में नौ महीने से एक साल तक का समय लगता है जबकि सिंगापुर, जापान, ब्रिटेन और ब्राजील जैसे देशों में तीन से पाँच महीने का समय लगता है।

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