रिजर्व बैंक पर होगा नीतिगत दर में कटौती का दबाव

रिजर्व बैंक पर होगा नीतिगत दर में कटौती का दबाव

नयी दिल्ली। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) और अन्य वृहद आर्थिक आँकड़ों में लगातार जारी गिरावट के मद्देनजर मांग बढ़ाने और पूंजी लागत में कमी लाने के उद्देश्य से बीच रिजर्व बैंक (आरबीआई) इस साल लगातार छठी बार नीतिगत दरों में एक चौथाई फीसदी की कटौती कर सकता है।

केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति समिति इस साल फरवरी से अक्टृबर तक अपनी लगातार पाँच बैठकों में रेपो दर में पाँच बार 0.25-0.25 प्रतिशत की कटौती कर चुकी है। इस प्रकार पाँच बार में रेपो दर कुल 1.25 प्रतिशत घटाई गयी है। इसके बावजूद अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत नहीं दिखने से उस पर 03 से 05 दिसंबर को होने वाली बैठक में एक बार फिर रेपो दर घटाने का दबाव होगा। रेपो दर वह दर है जिस पर रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को ऋण देता है।

सरकार द्वारा पिछले सप्ताह जारी आँकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की 30 सितंबर को समाप्त दूसरी तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर घटकर 4.5 प्रतिशत रह गयी जो छह वर्ष का निचला स्तर है। पहली तिमाही में यह पाँच प्रतिशत पर रही थी। रिजर्व बैंक ने अक्टूबर में जारी मौद्रिक नीति बयान में अनुमान जताया था कि दूसरी तिमाही में विकास दर 5.3 प्रतिशत रहेगी जबकि अगले छह महीने में इसके 6.6 से 7.2 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान व्यक्त किया गया था। यह लगातार छठी तिमाही है जब विकास दर में गिरावट दर्ज की गयी है। साथ ही यह वित्त वर्ष 2012-13 की अंतिम तिमाही के बाद विकास दर का निचला स्तर है।

उद्योग संगठन फिक्की ने जीडीपी वृद्धि दर में गिरावट को चिंताजनक बताते हुये कहा कि यह पूरी तरह अनपेक्षित भी नहीं था। फिक्की के अध्यक्ष संदीप सोमानी ने आर्थिक मोर्चे पर सरकार से ठोस कदम की अपेक्षा करते हुये कहा ''आने वाले महीनों में सरकार और आरबीआई का एक ही एक ही एजेंडा होना चाहिये- अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना। हम ...केंद्रीय बैंक से मौद्रिक नीति में और नरमी की उम्मीद करते हैं। हाउसिंग, रियल इस्टेट, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों, दूरसंचार और ऑटोमोबाइल क्षेत्र में और मजबूत उपाय करने की जरूरत है।ÓÓ उन्होंने उम्मीद जताई कि इनमें से कुछ कदम जल्द से जल्द देखने को मिल सकते हैं।

अर्थव्यवस्था के लिए जीडीपी का आँकड़ा एक मात्र चिंता का विषय नहीं है। आठ बुनियादी उद्योगों का उत्पादन सूचकांक लगातार दूसरे महीने पाँच प्रतिशत से ज्यादा लुढ़क गया। सितंबर में 5.1 प्रतिशत की गिरावट के बाद अक्टूबर में इसमें 5.8 फीसदी की गिरावट दर्ज की गयी। अगस्त में औद्योगिक उत्पादन में भी 1.1 फीसदी की गिरावट दर्ज की गयी थी जबकि सितंबर में यह 4.3 प्रतिशत घटा था।

एक तरफ उद्योग जगत की ओर से सस्ते कर्ज के लिए रेपो दर में कटौती की माँग की जा रही है और दूसरी तरफ सरकार भी हाउसिंग सेक्टर में फँसी परियोजनाओं में जान फूँकना चाहती है जिसके लिए मकान खरीदने वालों की किस्त कम होनी जरूरी है। इस प्रकार आरबीआई पर रेपो दर कम करने का इस बार दोहरा दबाव होगा।

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