कॉरपोरेट कर दर में कटौती की फिक्की की सिफारिश

कॉरपोरेट कर दर में कटौती की फिक्की की सिफारिश

नयी दिल्ली। उद्योग संगठन फिक्की ने आर्थिक विकास को बढ़ावा देने और कुल कर संग्रह बढाने के लिये आगामी बजट में कॉरपोरेट कर में कटौती कर उसे 25 फीसदी करने की सिफारिश की है। भारतीय वाणिज्य उद्योग महासंघ (फिक्की) का कहना है कि कर दर में यह कटौती टर्नओवर पर ध्यान दिये बिना सभी कंपनियों पर लागू की जानी चाहिये। फिक्की ने बजट पूर्व अपनी सिफारिश में व्यक्तिगत आयकर की 30 प्रतिशत वाली सबसे ऊंची दर 20 लाख रुपये से अधिक की वार्षिक आमदनी वालों पर ही लागू करने की बात की है। उसने कर ढांचे को सरल बनाने की दिशा में न्यूनतम वैकल्पिक कर (मैट) की दर घटाने की सलाह दी है। फिक्की का कहना है कि कारोबार को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाने के लिये कॉरपोरेट कर दर में कटौती जरूरी है। उद्योग महासंघ के मुताबिक कर की ऊंची दर के कारण कारोबार की उत्पादन लागत अधिक है जिसकी वजह से उसके पास पुनर्निवेश और विस्तार के लिये कम ही राशि रह पाती है। कॉरपोरेट कर की 30 प्रतिशत की दर और लाभांश वितरण पर 20 प्रतिशत की कर दर के कारण भारतीय कंपनियों के लिये मूल कर लागत काफी अधिक हो जाती है। सरकार ने कर प्रोत्साहन बंद कर दिया है और कॉरपोरेट कर में कटौती निर्धारित टर्नओवर वाली कुछ कंपनियों तक ही सीमित है। जब कई वैश्विक अर्थव्यवस्थायें कर दर में अच्छी खासी कटौती कर रही हैं तो भारत में भी कारोबारों के लिये इस पर विचार किया जाना चाहिये। अमेरिका द्वारा कॉरपोरेट कर को 35 प्रतिशत से घटाकर 21 प्रतिशत करना ऐतिहासिक है। ऐसे में यह महत्वूपर्ण है कि भारत भी वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा बनाये रखने के लिये कर दर का पुनर्विश्लेषण करे। फिक्की का मानना है कि मैट की 18.5 प्रतिशत की दर बहुत अधिक है और इसके कारण कंपनियों के पूंजी प्रवाह पर काफी असर पड़ता है इसी कारण इसकी दर भी घटायी जानी चाहिये। फिक्की ने कहा कि कारोबार के लिये वैज्ञानिक शोध काफी महत्वपूर्ण होता है। भारतीय अपने उपभोक्ताओं को अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी प्रदान करने के लिए तकनीकी सेवाओं और उत्पादों के उन्नयन के रूप में विदेशी तकनीशियनों को काफी राशि दे रहे हैं। अगर देश में ही शोध को लगातार बढ़ावा दिया जाये तो तकनीकी सेवाओं की फीस के रूप में दी जाने वाली रकम की बचत होगी और स्वदेशी कंपनियों को विकास का मौका मिलेगा। मेक इन इंडिया , कारोबार सरलीकरण और स्टार्ट अप को बढावा देने की सरकार की योजनाओं की तरह नवोन्मेष और वैज्ञानिक शोध को भी बढ़ाना देचा चाहिये। इसे देखते हुए उद्योग संगठन ने सरकार से सिफारिश कि है कि आयकर अधिनियम,1961 के तहत विभिन्न वैज्ञानिक शोधों के व्यय के लिये दी जाने वाली भारांकित आयकर कटौती जारी रखी जाये। फिक्की का कहना है कि कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) की गतिविधियों के मद में करदाताओं के व्यय को कारोबार के मद में किया गया व्यय नहीं माना जाता है और इसी कारण इसकी कटौती आय से नहीं की जाती है। सीएसआर में मद में किये गये खर्च से देश में कई सामाजिक परियोजनाओं में मदद मिल रही है और ऐसे में कटौती न करने का प्रावधान गलत है। फिक्की ने सिफारिश की है कि कारोबार की कुल आमदनी में से सीएसआर के मद में किये जाने वाले खर्च की कटौती की जानी चाहिये। कार्बन क्रेडिट के हस्तांतरण में 10 प्रतिशत के कर को स्वागत योग्य बताते हुये फिक्की ने मूल्यांकन वर्ष 2018-19 से पूर्व के वर्षों में भी लागू करने की सिफारिश की है। उसने धारा 80सी के तहत उल्लिखित सीमा को बढ़ाकर कम से कम 3,00,000 रुपये करने का सुझाव भी दिया है। उद्योग संगठन ने मौजूदा समय में मुद्रास्फीति दर में बढोतरी का हवाला देते हुये कर्मचारियों को दिये जाने वाले कर मुक्त भोजन की सीमा 50 रुपये से बढ़ाकर 200 रुपये करने की सिफारिश की है। विवाद निपटान पैनल (डीआरपी) के आदेश के खिलाफ राजस्व विभाग को अपील करने की अनुमति दिये जाने का सुझाव भी फिक्की ने दिया है। फिक्की का कहना है कि वित्तीय अधिनियम,2016 के जरिये किये गये संशोधन के बाद से मूल्यांकन अधिकारी को डीआरपी के आदेश के खिलाफ अपील की अनुमति नहीं रही है। [रॉयल बुलेटिन अब आपके मोबाइल पर भी उपलब्ध, ROYALBULLETIN पर क्लिक करें और डाउनलोड करे मोबाइल एप]

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