आर्ष गुरूकुल एटा: जहां शिक्षा के साथ मिलते हैं संस्कार,गुरूकुल का मुख्य आकर्षण 84 खंबों पर बनी 108 कुण्डीय यज्ञशाला



आर्ष गुरूकुल का परिसर लगभग 44 एकड़ में फैला है, बेहद ही खूबसूरत है। परिसर में 7 एकड़ का आम का बाग। 20 एकड़ में बनी विश्व की सबसे बड़ी 108 कुण्डीय यज्ञशाला, विद्यालय-भवन, छात्रावास, गौशाला, भोजनालय, औषधिभवन व अतिथिशाला। प्रातःकालीन वेदमंत्रों की आहुति से होनेवाला हवन-यज्ञ और विद्यार्थियों द्वारा सुमधुर ध्वनि में गाया जाता सामगान।

जी हां, यह है उ.प्र. के एटा जनपद मुख्यालय पर स्थित आर्ष गुरूकुल यज्ञतीर्थ। जहां गुरूकुल परम्परा के अंतर्गत विद्यार्थी अपने आचार्यो के सतत सानिध्य व निरीक्षण में वैदिक वांड्मय की शिक्षा ग्रहण करते हैं। महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय रोहतक से सम्बद्ध इस गुरूकुल में आचार्य (एम.ए.संस्कृत) स्तर तक शिक्षण की व्यवस्था है।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्यातिप्राप्त विद्वान व इस गुरूकुल के प्राचार्य डा. वागीश आचार्य गुरूकुल स्थापना के विषय में बताते हैं कि ''वर्ष 1948 में देश के स्वाधीन होने के उपलक्ष में स्वामी ब्रहमानंद दण्डी द्वारा इस स्थल पर 'विजय यज्ञ' का आयोजन कर चारों वेदों का परायण कराया गया था। वेदों के पारायण के लिए दक्षिण के वे वेदपाठी विद्वान बुलाए गये, जिन्हें स्वर सहित वेद कंठस्थ थे। इस यज्ञ के ब्राह्मण थे काशी के विद्वान पं. ब्रहमदत्त जिज्ञासु (इन्होंने ही सर्वप्रथम 6 माह में संस्कृत सीखने की पद्धति इजाद की है)।

लगभग एक माह चले इस यज्ञ के बाद इसमें हुए सभी व्ययों का भुगतान करने के उपरान्त भी जब पर्याप्त धनराशि व अन्नआदि बचे रह गये तो दण्डी जी ने जिज्ञासु जी के परामर्श पर यहां वेद-वेदांग के अध्ययन के लिए एक गुरूकुल स्थापित करने का निर्णय लिया। एटा के बड़े जमींदार व कांग्रेस नेता रोहनलाल चतुर्वेदी ने इस पुनीत कार्य के लिए अपनी 40 बीधा भूमि दान में दी। और 1948 में ही लाहौर गुरूकुल के आचार्य पं. ज्योतिस्वरूप के नेतृत्व में यह एटा गुरूकुल स्थापित हुआ।''

वर्ष 1980 तक इस गुरूकुल में वेद शास्त्रों का अध्ययन तो कराया जाता था, किन्तु इसकी कहीं से औपचारिक मान्यता नहीं थी। किन्तु 1980 में महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय रोहतक से सम्बद्ध होने के बाद इस संस्थान को आचार्य स्तरीय शिक्षण की मान्यता प्राप्त है।

गुरूकुल के अधिष्ठाता आचार्य देवराज शास्त्री के अनुसार वे 7 आचार्यों के सहयोग से गुरूकुल में प्रतिवर्ष 80 विद्यार्थियों को विद्यादान देते हैं।

एटा के इस गुरूकुल का मुख्य आकर्षण यहां की 84 खंबों पर बनी 108 कुण्डीय यज्ञशाला है। संस्थान का दावा है कि यह विश्व की सबसे बड़ी स्थाई रूप से बनी यज्ञशाला है। यह यज्ञशाला उसी स्थल पर निर्मित है, जहां 1948 में विजययज्ञ का आयोजन किया गया था। गुरूकुल प्रशासन की यज्ञशाला की दीवारों पर भावार्थ सहित सम्पूर्ण यजुर्वेद का उत्कीर्णन कराने की योजना है। वर्तमान में 10 से अधिक अध्यायों को उत्कीर्ण कराया भी जा चुका है।

लगभग 71 वर्षो से वैदिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार में लगे इस आर्ष गुरूकुल से निकले विद्यार्थियों में बीबीसी-लंदन की हिन्दी सेवा से जुड़े डा. भारतेन्दु विमल, उत्तराखंड विश्वविद्यायल के डा. विनय विद्यालंकार, डीएवी कालेज देहरादून के डा. धर्मेन्द्रनाथ शास्त्री, दिल्ली विश्वविद्यायल के डा. महेश विद्यालंकार, ओमनाथ विमली, डा. अवनीन्द्र जैसे शताधिक विद्वानों के बल पर इस गुरूकुल की सुगन्ध दिग्दिगन्त में इतनी सुवासित है कि देश के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह, जगजीवन राम सरीखे अनेक विख्यात राजनेता, दार्शनिक व विद्वान आर्ष गुरूकुल में पधार इस सुगन्ध के श्रोत के दर्शन कर कृतार्थ हुए हैं। तो दार्शनिक राष्ट्रपति डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने गुरूकुल के आचायों व छात्रों से राष्ट्रपति भवन में सामगान सुना है।


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