पर्यटन / तीर्थस्थल: चांदनी रात में रेणुका की शांति

पर्यटन / तीर्थस्थल: चांदनी रात में रेणुका की शांति

आज की भाग-दौड़ भरी जिंदगी से निकलकर कहीं जाना चाहें तो प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों पर गाडिय़ों से लदी सड़कें, लोगों के झुंड मिलते हैं। ऐसी स्थिति में ऐसी जगह जाया जा सकता है, जहां बस इतने लोग मिलें कि सहजता से मजा ले सकें। हिमाचल प्रदेश में ऐसी कई जगहें हैं जहां बहुत भीड़ रहती है लेकिन इन्हीं के बीच रेणुका ऐसी जगह है जहां भीड़ कम होती है। इस जगह झील के किनारे को चांदनी रात में महसूस करना आपको शांति का अनुभव देगा। पर्यावरण एवं वन मंत्रलय ने राष्ट्रीय वेटलैंड प्रबंधन समिति की सिफारिशों पर रेणुका झील को वर्ष 1998 में देश के चयनित 16 वेटलैंड्स में शामिल किया है।
हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर के मुख्यालय नाहन से शिमला रोड पर नौ किलोमीटर दूर दोसड़का से सड़क दाएं तरफ ऐसी ही जगह रेणुका ले जाती है। चढ़ती सड़क से नाहन शहर व अड़ोस-पड़ोस का विहंगम नजारा आनंद देता है। बादलों के हुजूम पहाडिय़ों की तलहटी से निकलकर मीलों तक उगे रहते हैं। थोड़ा आगे जमटा है जहां महंगे रिजॉटर्स और दूसरी आरामगाहें भी हैं जहां सप्ताहांत में दूर से आने वालों की एडवांस बुकिंग रहती है। मगर आप यहां रूकेंगे तो इस जगह को भूल नहीं पाएंगे।
जमटा से सड़क नीचे उतरती है। सर्पीले रास्ते पर पहाड़ी गांव, सीढ़ीनुमा खेत, स्वास्थ्यवर्धक चीड़ के वृक्ष की ताजा हवा, घने पेड़-पौधे लुभाते हैं। कई जगह हिमाचल पर्यटन विभाग की होमस्टे योजना के तहत रूकने के लिए कमरे व टेंट उपलब्ध हैं। बाबा बडोलिया आकर्षक स्टॉपेज है। पुराने पुल के एक तरफ मंदिर, ऊपर पहाड़ी से गिरता मौसमी झरना, दूसरी तरफ बहती पहाड़ी नदी, पड़ोस में छोटे-छोटे खेत। आगे फिर एक पुल है। स्वादिष्ट आम का बाग है।
इसके बाद ददाहू जाता है। यहां ठहरने के लिए किसान भवन, लोक निर्माण विभाग का रेस्ट हाउस, निजी गेस्ट हाउस, रेस्तरां व होटल उपलब्ध हैं। ददाहू से निकल पुराना पुल पार कर परंपराओं व रीति-रिवाजों के इलाके गिरीपार में बसी रेणुका झील पहुंचते हैं। हिमाचल की सबसे बड़ी, एशिया की प्राकृतिक झीलों में शामिल इस दो किलोमीटर से ज्यादा बड़ी ओवल आकार की झील की विशेष पहचान रही है। समुद्र तल से 672 मीटर ऊंचाई पर पसरी झील में उछलती महाशीर मछलियां सभी के साथ रिश्ता बना लेती हैं। यहां मछली पकडऩा और मांसाहार करना वर्जित है।
झील के आसपास का 402 हेक्टेयर क्षेत्र घोषित वन्यप्राणी शरण्य है। रेणुका संगड़ाह सड़क पर धनोई में मनोरम झरना है। इठलाकर गिरते, सभी को रोकते जल प्रपात का पानी खनिजयुक्त, मीठा, स्वादिष्ट, कहिए असली मिनरल वॉटर है। फर्न, रंग-बिरंगे फूल झरने को और दिलकश बनाते हैं। इसी क्षेत्र में रेणुका बांध भी प्रस्तावित है जहां से दिल्ली को पानी भेजा जाएगा।
झील के किनारे मंदिरों की श्रृंखला है। रेणुका जमदग्नि ऋषि की पत्नी थीं और महापराक्रमी परशुराम की माता। उन्हें किसी कारण पिता के आदेश पर माता रेणुका का सिर काटना पड़ा, फिर वर मांगकर उनके लिए जीवनदान भी प्राप्त कर लिया। झील को त्रेतायुग में 'राम सरोवर' कहते थे, फिर रेणुका स्मृति में रेणुका कहा जाने लगा। ऊंचाई से देखने पर कभी यह झील महिला आकार की लगती है। मगर बढ़ रही गाद ने इसे सिकोड़ दिया है। हालांकि मां प्रकृति ने इसकी सुंदरता को काफी हद तक बरकरार रखा है।
झील के सानिध्य में रात बिताई जाए और रात चांदनी में लिपटी हो तो प्रियजनों के साथ बिताया गया वक्त यादगार बन जाता है। अपने आप से भी खुलकर मिल सकते हैं। पक्षियों का कलरव जब आपको सुबह-सुबह नींद से जगाएगा और लॉन में बैठकर झील के ठहरे पानी को उनींदी आंखों से छूते हुए चाय का स्वाद लेंगे तो यहां के एकाकीपन में फिर आने का वादा अपने आप से करेंगे।
कार्तिक एकादशी को चांदी की पालकी में परशुराम माता रेणुका से मिलने यहां के मेले में पधारते हैं। मनोरम झील के पड़ोस में अनेक किस्म के प्रवासी परिंदे सर्दी के मौसम में हर बरस आते हैं। उनके यहां ठहरने से पर्यावरण और गुलजार हो उठता है। विशेषकर बाल पर्यटकों व वाइल्ड लाइफ प्रेमियों के लिए मेहमान पक्षी आकर्षण का केंद्र बन जाया करते हैं। झील परिक्रमा पैदल करें तो प्राकृतिक आनंद मिलता है। वैसे अब बैटरी चलित वाहन भी उपलब्ध हैं। रेणुका से पांच किलोमीटर दूर जामू कोटी पर्वत पर जमदग्नि ऋषि का मंदिर, पुराना हवन कुंड, तपस्या स्थल है।
रेणुका दिल्ली से 285, चंडीगढ़ से 127, शिमला से 162, नाहन से 37 किलोमीटर है। बस, कार, टैक्सी उपलब्ध हैं।
- नरेंद्र देवांगन

Share it
Top