दिग्विजयी बने परशुराम!

दिग्विजयी बने परशुराम!

यह बात त्रेता युग के प्रारंभकाल की है। सरस्वती नदी के तट पर महर्षि जमदग्नि अपनी प्रिय पत्नी रेणुका के साथ आश्रम में सुविधापूर्वक निवास करते थे। इसी आश्रम में 'परशुराम' ने जन्म लिया था।

उन दिनों विश्वविख्यात राजा सहस्त्रबाहु अपनी शक्ति को अर्जित कर लोगों पर अत्याचार कर रहा था। उसने एक दिन महर्षि जमदग्नि के आश्रम पर हमला बोल दिया। महर्षि उसकी सेना से मुकाबला न कर पाए। परशुराम उस समय जंगल में समिधा लेने गए हुए थे। सहस्राबाहु ने महर्षि की प्रिय गाय 'होमधेनु' को अपने कब्जे में करके आश्रम को जलाकर तहस-नहस कर दिया।

पिताजी! अब मैं। इस दुर्दांंत राजा का वध करके रहूंगा। परशुराम ने पिता जमदग्नि से कहा।

बेटा! उस शाक्तिशाली राजा से युद्ध में विजय प्राप्त करना संभव नहीं है, अत: पहले भगवान् शिव को प्रसन्न करो और उनसे दिव्यवस्त्र प्राप्त करो, उनका शिष्यत्व स्वीकार करो दीक्षा के उपरान्त ही तुम राजा को पराभव दिखा सकते हो।

अब परशुराम हिमालय पर्वत पर निवास कर रहे भगवान् शंकर के पास गए। शंकर जी के पुत्र गणेश जी उन्हें अपने पिता से मिलने नहीं देना चाहते थे। क्र ोधयुक्त परशुराम ने गणेश जी को भूमि में पटक दिया और उनका परसा छीनकर एक दांत भी तोड़ डाला।

भगवान् परशुराम की वीरता से शिवजी प्रसन्न हुए। उन्होंने शस्त्र और शास्त्र की उचित दीक्षा दी। सभी विद्याओं से पारंगत होकर परशुराम अपने लक्ष्य की पूर्ति हेतु पुन: अपने पिता के आश्रम में लौटे।

मार्ग में एक युवक त्रिशूलधारी ने परशुराम को रोक लिया और उनके सीने पर त्रिशूल लगा दिया। दोनों लोगों में परस्पर भयंकर युद्ध छिड़ गया। परशुराम ने अपनी बुद्धि कौशल से उस त्रिशूलधारी को पराजित करना चाहा, परन्तु त्रिशूलधारी उन पर भारी पड़ रहा था।

आखिर में परशुराम ने अपने यान्त्रिक उपाय से उस त्रिशूलधारी का त्रिशूल छीनकर दूर फेंक दिया और मल्लयुद्ध करते हुए उसे भूमि में पटक दिया और फिर विद्युतगति से गणेश जी द्वारा प्राप्त किए गए फरसे से उस त्रिशूलधारी युवक के मस्तक पर प्रहार कर दिया। युवक के मस्तक से रक्त की धारा फूट पड़ी।

अरे! यह क्या हुआ? परशुराम अब उस युवक को देखकर रोने लगे। वास्तव में वह युवक और कोई नहीं, भगवान् शिवजी स्वयं अपने प्रिय शिष्य परशुराम की परीक्षा ले रहे थे।

गुरूदेव! मुझे क्षमा कर दें। हमसे बहुत बड़ी भूल गई है। उन्होंने त्रिशूल उठाकर शिवजी के हाथ में दे दिया।

बेटा! रोओ मत। मैं तुम्हारी परीक्षा ले रहा था। तुम मुझसे युद्ध कौशल में विजयी हुए। एक शिष्य के विजयी होने पर गुरू को जो प्रसन्नता होती है, तुम उसकी कल्पना नहीं कर सकते हो? अब तुम अपने लक्ष्य को शीघ्र प्राप्त करोगे। यह मेरे मस्तक पर जो प्रहार तुमने किया है, यह आज से मेरा तीसरा नेत्र होगा। मैं तुम्हें विजयी भव का शुभाशीष प्रदान करता हूं। यह कहकर शिवजी अन्र्तध्यान हो गए।

आगे चलकर परशुराम जी ने उसी फरसे से सहस्रबाहु को मौत के घाट उतार दिया। उसके कुख्यात एक सौ पुत्रों को यमलोक पहुंचाकर धर्म की रक्षा की। फिर अपने माता-पिता की रक्षा करते हुए आश्रम का नव निर्माण कराया। साथ ही युद्ध द्वारा प्राप्त विजयी भूमि कश्यप ऋषि को दान कर दी।

- डा. विजय प्रकाश त्रिपाठी

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