मानव जीवन के कुशल चितेरे तुलसीदास

मानव जीवन के कुशल चितेरे तुलसीदास

रामभक्त इतिहासकार , कुशल राजनीति मर्मज्ञ, मानवीय संवेदनाओं के सूक्ष्म विश्लेषक, काव्यकला पारंगत महामना तुलसी दास का जिस समय आविर्भाव हुआ, उस समय भारतीय जनमानस की स्थिति अत्यंत शोचनीय और दुखद थी। अधिकतर जनमानस वैभव हीन और मुस्लिम आक्रांन्ताओं के जुल्मों से त्रस्त और पराज्य-भावनाग्रसित था। उसे उस समय भगवान का भी सहारा नहीं दिख रहा था। आक्रांन्ताओं के जुल्म सहते-सहते एक सबल सहारे की तलाश में वह बहुदेववाद की अंधी जकडऩ में बंट चुका था। एक पन्थ या देवता को मानने वाले दूसरे देवता या पन्थ को मानने वाले लोगों से शत्रुताभाव रखते थे जिसका पूरा लाभ विदेशी आक्रान्ताओं को मिल रहा था। शत्रुओं का सामूहिक प्रतिकार संभव ही नहीं हो पा रहा था। हिन्दू असंगठित और जाति-वर्गवाद में उलझा एक निरीह समाज बन कर रह गया था।

ऐसे में जब हिन्दू समाज हर ओर से निराश और हताश हो चुका था विक्र म सम्वत 1554 की श्रावण शुक्ला सप्तमी को तुलसीदास के रूप में हिन्दू धर्म-रक्षक, वर्ग और पन्थ समन्वयक का जन्म बांदा जिले के राजा पुर ग्राम में एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में हुआ। कहा जाता है कि जन्म के समय तुलसीदास ने रुदन के स्थान पर रामोच्चार किया था जिसके कारण उन्हें एक महानात्मा के रूप में मान्यता मिल गयी थी। प्रारम्भिक शिक्षा के उपरान्त तत्कालीन परम्पराओं के अनुसार किशोरावस्था समाप्त होते ही तुलसीदास का विवाह हो गया। पत्नी के सम्मोहन,आकर्षण और उसके सदुपदेश की कथा हर हिन्दू को पता है। दांपत्य जीवन से विरक्ति के उपरान्त तुलसीदास का रुझान धर्म और भगवान राम की ओर हुआ। तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था और हिन्दू समाज की दीन-हीन दशा से तुलसी स्वयं बहुत त्रस्त थे।

सूकर क्षेत्र में पहली बार उन्होंने अपने गुरु से रामकथा सुनी जो संस्कृत से उसका अनुवाद करके सुनाते थे। वे चाहते थे कि धर्म और समाज के लिए एक तात्कालिक व्यवस्था और ताने-बाने के रूप में एक धार्मिक ग्रन्थ की रचना की जाय जो हिन्दू समाज का मार्ग - दर्शन और छिन्न व्यवस्था को व्यवस्थित कर सके। इसके लिए कहा तो यह जाता है कि स्वयं भगवान शिव ने अपने स्वरूप के दर्शन कराकर उन्हें राम कथा लिखने की सद्प्रेरणा दी।

संवत् 1628 में तुलसीदास अयोध्या की ओर चल पड़े। उन दिनों प्रयाग में माघ मेला लगा हुआ था। वे वहाँ कुछ दिन के लिये ठहर गये। पर्व के छ: दिन बाद एक वटवृक्ष के नीचे उन्हें भारद्वाज और याज्ञवल्क्य मुनि के दर्शन हुए। वहाँ उस समय वही कथा हो रही थी जो उन्होने सूकरक्षेत्र में अपने गुरु से सुनी थी। माघ मेला समाप्त होते ही तुलसीदास जी प्रयाग से पुन: वापस काशी आ गये और वहाँ के प्रह्लादघाट पर एक ब्राह्मण के घर निवास किया। वहीं रहते हुए उनके अन्दर कवित्व-शक्ति का प्रस्फुरण हुआ और वे संस्कृत में पद्य-रचना करने लगे परन्तु दिन में वे जितने पद्य रचते, रात्रि में वे सब लुप्त हो जाते। यह घटना रोज घटती। आठवें दिन तुलसीदास जी को स्वप्न आया। भगवान शंकर ने उन्हें आदेश दिया कि तुम अपनी भाषा में काव्य रचना करो। तुलसीदास जी की नींद उचट गयी। वे उठकर बैठ गये। उसी समय भगवान शिव और पार्वती उनके सामने प्रकट हुए। तुलसीदास जी ने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। इस पर प्रसन्न होकर शिव जी ने कहा- 'तुम अयोध्या में जाकर रहो और हिन्दी में काव्य-रचना करो। मेरे आशीर्वाद से तुम्हारी कविता सामवेद के समान फलवती होगी'।

यह आदेश सुनकर संवत् 1631 में तुलसीदास ने 'रामचरितमानस' की रचना शुरु की। दैवयोग से उस वर्ष रामनवमी के दिन वैसा ही ग्रह योग आया जैसा त्रोतायुग में राम-जन्म के दिन था। उस दिन प्रात:काल तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस की रचना प्रारम्भ की। दो वर्ष, सात महीने और छ्ब्बीस दिन में यह अनुपम और अद्भुत ग्रन्थ सम्पूर्ण हुआ। संवत् 1633 के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में राम-विवाह के दिन सातों काण्ड पूर्ण हो गए।

इसके बाद भगवान् की आज्ञा से तुलसीदास जी काशी चले आये। वहाँ उन्होंने भगवान विश्वनाथ और माता अन्नपूर्णा को श्रीरामचरितमानस सुनाया। रात को पुस्तक विश्वनाथ-मन्दिर में रख दी गयी। प्रात:काल जब मन्दिर के पट खोले गये तो पुस्तक पर लिखा हुआ पाया गया- 'सत्यं शिवं सुन्दरम' जिसके नीचे भगवान शंकर की सही (पुष्टि) थी। उस समय वहाँ उपस्थित लोगों ने 'सत्यं शिवं सुन्दरम' की आवाज भी कानों से सुनी थी, ऐसा विश्वास किया जाता है। तुलसीदास जी जब काशी के विख्यात् घाट असीघाट पर रहने लगे तो एक रात कलियुग मूर्त रूप धारण कर उनके पास आया और उन्हें पीड़ा पहुँचाने लगा। तुलसीदास जी ने उसी समय हनुमान जी का ध्यान किया। हनुमान जी ने साक्षात् प्रकट होकर उन्हें प्रार्थना के पद रचने को कहा। इसके पश्चात् उन्होंने अपनी अन्तिम कृति 'विनय-पत्रिका' लिखी और उसे भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया। श्रीराम जी ने उस पर स्वयं अपने हस्ताक्षर कर दिये और तुलसीदास जी को निर्भय कर दिया।

संवत् 1680 में श्रावण कृष्ण तृतीया शनिवार को तुलसीदास जी ने 'राम-राम' कहते हुए अपना शरीर परित्याग किया।

तुलसीदासने ही दुनिया को 'हनुमान चालीसा' नामक डर को मिटाने वाला मंत्र-रूप ग्रन्थ दिया है जिसमें चालीस पदों के माध्यम से सभी विघ्न-बाधाओं के हरण की शक्ति का संयोग और समन्वय है। कहा जाता है कि हनुमान चालीसा के पाठ से सभी भय-विकार मिट जाते हैं। तुलसीदास जी ने देवनागरी लिपि में अपने ग्रन्थों को सामान्य जनों को समर्पित करके हिन्दी के भी समानुपातिक सम्वर्धन में अनुपम सहायता की है। भारतभूमि सदैव अपने इस महान रत्न पर नाज करेगी।

जहाँ तक 'रामचरितमानस' का प्रश्न है। रामचरितमानस कोई साधारण काव्य-रचना या ग्रन्थ नहीं है। वह स्वयं में एक विज्ञान अनुपूरित सामाजिक और मानवीय विज्ञान (ह्यूमन-साइंस) का अदभुत समन्वय तो है ही, एक ऐतिहासिक घटना के तारतम्य वर्णन के कारण एक प्रमाणित ऐतिहासिक ग्रन्थ भी है जो अपनी कथा के साथ तात्कालिक परम्पराओं और व्यवस्थाओं का सजीव चित्रण करता है। तत्कालीन विभिन्न सामाजिक और धार्मिक मान्यताओं और शासकीय व्यवस्थाओं का उनके नियमों और उपनियमों सहित दिग्दर्शन इस ग्रन्थ की अदभुत क्षमता को प्रकट करता है। बहुदेववाद को किस चतुरता से तुलसीदास ने एक सूत्रीय धर्म का स्वरूप दिया है यह उनकी जनहितकारी सोच का उत्कृष्ट उदाहरण है। घातक वर्गवादी व्यवस्था को एक सरल और समन्वित सूत्र में कसे ताने-बाने में बाँध देने की अदभुत क्षमता तुलसीदास की सामाजिक विज्ञान पर गहरी पकड़ तो प्रकट करती ही है। रामचरितमानस को एक उत्कृष्ट सामजिक ग्रन्थ भी संघोषित करती है।

अगर सही मायनों में देखा जाए तो रामचरितमानस के रूप में तुलसीदास ने तत्कालीन दिग्भ्रमित समाज को एक स्वस्थ सामाजिक व्यवस्था दी। एक लिखित सामाजिक जो आवश्यकता पडऩे पर धार्मिक और राजनैतिक उद्देश्यों की सम्पूर्ति भी कर सके, ऐसा संविधान दिया। भारतीय संस्कृति को तुलसीदास ने जो अकल्पनीय योगदान दिया, वह संस्कृत के महान ग्रन्थों में तो स्थान-स्थान पर उपलब्ध है पर जनता की भाषा में उनके अतिरिक्त कोई अन्य उन्हें समन्वित करके दे नहीं सका है।

- राज सक्सेना

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