हस्तिनापुर जो द्रोपदी के श्राप से आज तक मुक्त नहीं हो पाया!

हस्तिनापुर जो द्रोपदी के श्राप से आज तक मुक्त नहीं हो पाया!


मेरठ। मेरठ के निकट हस्तिनापुर कभी पांडवों की राजधानी थी। कौरवों और पांडवों के कई महल और मंदिरों के अवशेष यहां मिलते हैं। हस्तिनापुर में ही पांडवों के सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर जुए में द्रोपदी सहित अपना सब कुछ हार गए थे। पौराणिक कथा अनुसार गंगा की बाढ़ के कारण यह नगर पूरी तरह से तबाह हो गया था। उसके बाद पांडव हस्तिनापुर को छोड़कर कौशांबी चले गए थे।

चीरहरण के समय द्रोपदी ने हस्तिनापुर को श्राप दिया था कि जहां नारी का सम्मान नहीं होता वह जमीन पिछड़ जाती है। उस श्राप का असर आज भी देखने को मिल रहा है।

यहां पर स्थित पांडेश्वर महादेव मंदिर के बारे में कहा जाता है कि रानी द्रोपदी इसी मंदिर में पूजा करने के लिए आया करती थीं और यहीं पर कौरवों और पांडवों ने वेदों और पुराणों की शिक्षा ली थी। कर्ण मंदिर भी यहीं पर स्थित है। कहा जाता है कि इस मंदिर में कर्ण ने स्वयं शिवलिंग की स्थापना की थी। इसके अलावा यहां जैन मंदिर भी है। हस्तिनापुर को धर्म नगरी के नाम से भी जाना जाता था। महाभारत कालीन पांडव टीला आज भी यूपी के मेरठ में मौजूद है। पांडव टीले पर एक कुआं बना हुआ है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसी कुएं के पानी से द्रौपदी और पांडव स्नान किया करते थे।

आज भूमि में दफन है पांडवों का किला

भीष्म ने गांधारी की इच्छा के विरुद्ध धृतराष्ट्र से उसका विवाह करवाया था और जब भरी सभा में द्रोपदी को निर्वस्त्र किया जा रहा था तब भीष्म चुप बैठे थे। इसी तरह दुर्योधन ने अनगिनत पाप किये थे। कहते हैं दुर्योधन ने भी भानुमति से बलपूर्वक विवाह किया था। पांडवों को बिना किसी अपराध के उसने ही तो जलाकर मारने की योजना बनाई थी। दुर्योधन की ज़िद, अहंकार और लालच ने लोगों को युद्ध की आग में झोंक दिया था। शकुनि ने दुर्योधन को भड़काया और पांडवों को जुआ खेलने पर मजबूर किया था। कौरवों और पांडवों के बीच भयंकर लड़ाई इसी जगह से हुई थी इस युद्ध में पांडवों की जीत हुई थी। यह वही जगह है जहां पर श्री कृष्ण ने अर्जुन को कर्म का संदेश दिया था। कान्हा की कर्मभूमि थी। आखिर हस्तिनापुर का विकास क्यों नहीं हो पाया। उसकी वजह है द्रोपदी द्वारा दिया गया हस्तिनापुर को एक श्राप।

चीरहरण के समय द्रोपदी ने हस्तिनापुर को श्राप दिया था कि जहां नारी का सम्मान नहीं होता वह जमीन पिछड़ जाती है। उस श्राप का असर आज भी देखने को मिल रहा है।

1949 में सरकार इसे एक बड़ा पर्यटन स्थल बनाना चाहती थी और वह कार्य आज तक जारी है। द्रोपदी के श्राप के कारण हस्तिनापुर की कभी तरक्की ना हो सकी। द्रोपदी के श्राप के कारण महाभारत काल का यह शहर तरक्की में पीछे छूट गया। यह श्राप 5000 साल पुराना है जिसका असर आज भी दिखता है।


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