पर्यटन/तीर्थस्थल: दर्शन को तैयार, चारों धाम के द्वार

पर्यटन/तीर्थस्थल: दर्शन को तैयार, चारों धाम के द्वार

देव भूमि उत्तराखंड सदियों से ऋृषि मुनियों की तपस्थली रही है। यह ही कारण है कि लाखों करोड़ों श्रद्धालु हर वर्ष पुण्य कमाने के लिये देश विदेश से उत्तराखंड के विभिन्न तीर्थ स्थानों के साथ ही चार धाम यात्र पर आते हैं। यू तो आज भागम भाग की जिन्दगी में सब कुछ बदल गया है। अब वो पहली जैसी भक्ति नजर नहीं आती। इंसान आज पैसे से भक्ति के साथ साथ भगवान को भी खरीदना चाहता है।

पहले जमाने में पैदल चलते चलते पांव में छाले पड़ जाते थे पर माथे पर कष्ट की एक लंकीर तक नजर नहीं आती थी।

तीर्थ यात्रा पर निकले लोगों पर तीर्थ का दिव्य वातावरण, वहां विद्यमान ऋृषि-मुनियों की सुन्दर वाणी से निकलने वाली ज्ञान की गंगा और साधक हदय में उपस्थित भक्ति, भक्त के जीवन को नई दिशा देने के साथ साथ उस की आत्मा को परमात्मा से मिला देती थी।

पिछले तीन या चार दशक पहले तक तीर्थयात्रा केवल आध्यात्मिक अर्थों में ही महत्त्वपूर्ण नहीं होती थी बल्कि हमारी ऐसी तमाम तीर्थयात्राओं का समाज के साथ साथ राष्ट्र पर गहरा प्रभाव पड़ता था। गरीब लोगों की मदद होती थी और मन स्वच्छ हो जाता था। मंदिरों और मठों में बने दिव्य स्थानों में प्राण-चेतना उभारने वाले प्रशिक्षण प्रवचन व धार्मिक पाठयक्र मों के पाठ से लाभ प्राप्त कर मनुष्य धन्य हो जाता था।

यूं तो चारधाम राष्ट्र के चारों कोनों में स्थापित जगन्नाथ, रामेश्वरम, द्वारिका और बद्ररीनाथ को कहा जाता है। ज्ञान की उपासक रही हिंदू परम्परा में देव संस्कृति में प्रारम्भ से ही चार धामों के प्रति अपार श्रद्धा रही है। जिस प्रकार चारों वेदों के मंत्रों में ईश्वर का वास माना जाता है ठीक उसी प्रकार मन से भगवान की भक्ति में लीन होने के बाद चार धामों में भी भक्तजनों को ईश्वरत्व की सहज ही अनुभूति प्राप्त होती है।

बद्रीधाम:- महाभारत व पुराणों में बद्रीनाथ का वर्णन बद्रीवन, बद्रिकाश्रम, तथा विशाला नाम से भी मिलता है। लगभग 15 मीटर ऊंचे भव्य द्वार से सजे बद्रीनाथ मंदिर का वर्तमान स्वरूप आदि शंकराचार्य जी की देन है। देव भूमि उत्तराखंड के चमोली जनपद में अलकनंदा नदी के तट पर स्थित बद्रीनाथ का यह मंदिर भगवान विष्णु व उनके अवतार नारायण को समर्पित है। बदरी शब्द 'ब' एवं 'दरी' शब्दों के संयोग से बना है। 'ब' का अर्थ है-परमात्मा और दरी का अर्थ है 'गुहा', अर्थात बद्रीनाथ वो स्थान माना जाता है जहां परमतत्व की चेतना घनीभूत हो उठती है। महर्षि व्यास ने यही पर पुराण लेखन भी किया था।

केदारनाथ:- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार राजा केदार ने यहा कड़ी तपस्या की जिन के नाम पर इस स्थल का नाम केदारधाम पड़ा। आदिदेव शिव कला के भी देवता हैं। वहीं बारह ज्योतिर्लिंगों में एक केदारनाथ भी है। शंकराचार्य जी ने यहां 32 वर्ष की आयु में तपस्या कर अपना शरीर त्याग दिया था। ऋृषि उपमन्यु ने भी यहां कठोर तप किया था। महाभारत के बाद पाण्डव भी यहां तप करने आये थे। भगवान महादेव को समर्पित प्राचीन केदारनाथ मंदिर आस्था के साथ साथ कला के रूप में भी विश्व में प्रसिद्व है।

गंगोत्री धाम:- हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार पूर्वजों को श्रापमुक्त करने के लिये राजा भगीरथ ने यहां भगीरथी शिला पर तपस्या करके गंगा को यही पर धरती पर उतारा था। गंगा इन्हीं के तप-पुरूषार्थ से अवतरित हुई थी, इस लिये भगीरथी कहलाई जाती है। प्रमुख देव स्थल गोमुख गंगोत्री से 14 किमी दूर है। प्राचीन काल में ये स्थल गंगोत्री में ही हुआ करता था। गंगोत्री धाम संस्कृति और जीवन का प्रमुख धाम है। गंगोत्री से कुछ ही दूरी पर चीड़ के वृक्षों का वन 'भेजवासा' तथा फलों का वन 'फूलवासा स्थित है।

यमुनोत्री:- यमुनोत्री यमुना नदी का उद्गम स्थल है। मान्यता है कि शनि देव और यमराज ने अपनी बहन यमुना को वरदान दिया था कि जो कोई यमुनोत्री आकर पूजा अर्चना करेगा, वह यम यातना व शनि के दंड से मुक्त रहेगा। उत्तरकांशी जिले से 171 किमी में 3291 मीटर की ऊंचाई पर वर्ष भर बर्फ से इस के शिखर ढके रहते हैं। बंदर पूंछ इसी पर्वत के पश्चिमी किनारे पर है। यमुनोत्री मंदिर का निर्माण 1850 ई० में राजा सुर्दशन शाह ने कराया था। यमुनोत्री के निकट तीर्थ स्थलों में सूर्यकुण्ड, दिव्यशिला, हर की दून, हनुमान मंदिर आदि प्रमुुख हैं। तो चलें चार धाम की यात्रा पर।

- शादाब जफर 'शादाब'

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