बोध कथा: सज्जनता और ईश्वर भक्ति

बोध कथा: सज्जनता और ईश्वर भक्ति

एक बार महाराज भोज के मन में एक प्रश्न उठा। इसका उत्तर पाने के लिये उन्होंने अपने सभासदों को बुलाया और उनके सम्मुख अपना प्रश्न रखा। प्रश्न था कि संसार में सज्जनता बड़ी है या ईश्वर भक्ति?

इस विषय पर काफी चर्चा हुई। सभी सभासदों ने अपने अपने विचार रखे लेकिन कोई भी सभासद ऐसा उत्तर नहीं दे पाया जिससे राजा संतुष्ट हो जाते।

राजा को प्रश्न का संतोषजनक उत्तर न मिल पाने के कारण उनका प्रश्न अनुत्तरित ही रह गया।

काफी समय बीत जाने के बाद, राजा भोज एक दिन वन भ्रमण के लिये गये। जब वे घने जंगल के बीच अपने साथियों के साथ घोड़े पर चल रहे थे, तभी अचानक कुछ वनवासियों ने दुश्मन जान कर उन पर हमला बोल दिया। इस तरह अचानक आक्रमण की वजह से उनके सारे साथी तितर बितर हो गये और उनका राजा से संबंध टूट गया।

राजा अनजाने जंगल में राह भटक गया। वह चलते चलते थक कर चूर हो गया। प्यास के मारे उसका कंठ सूख रहा था लेकिन दूर दूर तक कहीं जल दिखाई नहीं पड़ रहा था।

भटकते हुए राजा को अचानक एक पर्णकुटीर दिखाई पड़ी। राजा को संबल मिला और वे लडख़ड़ाते कदमों से कुटिया की तरफ चल पड़े। उन्होंने कुटिया के द्वार पर पहुंच कर देखा कि एक बूढ़ा महात्मा आंखें मूंदे बैठा तपस्या में लीन था राजा कुछ देर चुपचाप खड़े रहे, फिर वे मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।

कुछ समय के बाद जब राजा भोज की चेतना लौटी तो उन्होंने देखा कि वही महात्मा जो कुछ समय पहले तपस्या में लीन था, राजा के मुख पर जल के छींटे मार रहा था, पंखा झेल रहा था और थोड़ा थोड़ा जल राजा के मुंह में डाल रहा था।

राजा भोज को यह सब देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने उठकर बैठते हुए महात्मा से कहा हे महात्मा। आपने मेरे लिये व्यर्थ ही अपनी तपस्या भंग कर दी। मेरे कारण आपका उपासना क्रम टूट गया। यह तो अनर्थ हो गया।

महात्मा ने बड़े प्यारे राजा की ओर देखा, मुस्कराये और बड़े शांत स्वर में कहा वत्स, परमात्मा की इच्छा है कि उसके संसार में कोई भी प्राणी दीन दुखी न हो। कष्ट में न हो। अत: ईश्वर की इस इच्छा का महत्त्व उपासना से कहीं अधिक है। दीन-दुखियों की सेवा करना और सज्जनता का भाव प्राणों में ईश्वर भक्ति का सबसे श्रेष्ठ रूप है।

महात्मा का कथन सुनकर राजा भोज को अपने प्रश्न का उत्तर आज स्वत: ही मिल गया और वह सदा ही दीन दुखियों की सेवा में लगे रहे।

- परशुराम संबल

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