गणेश चतुर्दशी पर गणपति जी की अनुकम्पा प्राप्त करने के लिए उनके चरित्र को अपनाएं

हिन्दू धर्म में बाबा गणपति का अपना एक विशेष स्थान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गणपति जी की अराधना के बिना किसी भी ईष्ट की पूजा सार्थक नहीं मानी जाती। किसी भी शुभ कार्यो को करने से पहले गणपति जी का ध्यान-आराधना करके ही उसे सम्पूर्ण किया जाता है। ये भारतीय देव परंपरा में सबसे विलक्षण देवता है। मान्यता है कि ये विघ्नहर्ता है, ये ही ऋद्धि-सिद्धि प्रदान कर सभी मनोरथ को पूरा करने वाले है। ये सभी देवताओं के भी अराध्य देव कहे जाते है। अगर गणपति जी किसी से रूष्ट हो जाये तो उसका कोई देव सहायक नहीं बनता। इसलिए हमारे संतों ने गणेश जी को प्रथम आराध्य माना।

आखिर गणेश जी को इतनी महत्वपूर्णता क्यों दी गई, क्यों इनकी प्रथम पूजा की जाती है। इस विषय पर प्रकाश डालते हुए वैभव कुंज शुक्रताल के संस्थापक पं. राजपाल भारद्वाज ने बताया कि पुरातन मान्यता के अनुसार महादेव के दोनों पुत्रों गणेश जी व कार्तिकेय के बीच विवाद हुआ कि दोनों में कौन श्रेष्ठ है। शिव के निर्णय अनुसार जो अपने-अपने वाहनों पर बैठ कर संपूर्ण पृथ्वी व सभी तीर्थों की परिक्रमा लगााकर प्रथम वापस लौटेगा, वो ही विजेता होगा वो ही श्रेष्ठ होगा, उसकी ही प्रथम पूजा की जायेगी। कार्तिकय जी का वाहन मोर था व गणेश जी का वाहन मूशक था। इस प्रकार गणेश जी ने तुरन्त ही अपनी बुद्धिमत्ता का प्रयोग करके अपने माता-पिता की ही परिक्रमा लगा ली, व कहा कि माता पिता में ही सारे तीर्थ व संपूर्ण ब्रहमाण्ड समाहित है। इसलिए मैं आप दोनों की परिक्रमा करके सभी तीर्थों का फल अर्जित कर चुका हूँ। गणपति जी की इस बात से माता पार्वती व भोले बाबा उनके विवेक से अति प्रसन्न हुए व उन्होंने गणेश जी को विजेता बनाकर उन्हें वरदान दिया कि जाओ दोनों में तुम ही श्रेष्ठ हो दुनिया में तुम्हारी ही पूजा प्रथम होगी। प्रथम तुम्हारी पूजा अर्चना कर ही साधक अपने ईष्ट की पूजा सार्थक कर पायेगा।

माता-पिता के समक्ष गणपति ने वेद में लिखा जो अपनी माता-पिता की पूजा करता है उसे सम्पूर्ण तीर्थों का फल प्राप्त होता है । गणपति ने यह सिद्ध कर दिया कि हमारे जीवित देवी-देवता तो हमारे माता पिता ही है। अगर हमें गणपति बाबा की अनुकम्पा चाहिए तो उनकी पूजा-अर्चना से ज्यादा महत्व उनके गुणों का अनुसरण कर उसे अपने जीवन में उतारने से है। तभी जाकर गणेश जी की हम पर विशेष कृपा प्राप्त होगी। आज हम पाश्चात्य संस्कृति के शिकार होकर अपने माता-पिता का तो तिरस्कार कर रहे है, व गणेश जी को पंच मेवा का भोग लगा कर और आशा कर रहे है कि गणेश जी हमारे सारे विध्न बाधाओं को हर लेंगे। हमें चाहिए कि हम गणपति जी से प्रेरणा ले व प्रथम अपनी माता-पिता की अराधना करें फिर जिस भी देवी-देवता का ध्यान व पूजा करनी है करे। अपने माता-पिता का तिरस्कार करके हम कभी परमात्मा की कृपा व उसकी अनुकम्पा प्राप्त नहीं कर सकते। गणपति जी के रास्ते पर चलकर यदि हमने अपने माता-पिता के हृदय को जीत लिया तो स्वत: हम पर परमात्मा की रूहानी अनुकंपा आनी शुरू हो जायेगी। इस प्रकार हमारी सारी साधना सफल हो जायेगी। जिस घर में व्यक्ति से उसके माता-पिता सन्तुष्ट नहीं है, जो संतान अपने माता-पिता का निरादर व तिरस्कार करती है, उस घर को देवता गण छोड कर चले जाते है। उस व्यक्ति पर उसके देव पितृ भी अपनी अनुकंपा नहीं करते, वह कभी सुखी नहीं होता। सारे ग्रह नक्षत्र उसके विपरीत अनुसरण करने लगते है, उसकी सारी पूजा-अर्चना, जप-तप व समस्त परोपकार क्षीण हो जाते हेै। वह इस लोक व परलोक में धोर कष्ट प्राप्त करता है। उस व्यक्ति की संताने भी उसका आदर नहीं करती व मरते समय तक उस व्यक्ति को घोर कष्ट प्रदान करती है। व्यक्ति के ईष्ट की कृपा भी उस पर नकारात्मक बनी रहती है।

हमें सोचना चाहिए कि जब देवता गण भी माता-पिता के शाप व वरदान से अछूते नहीं रह पाये तो हम तो आम जन मानस ही है। हम कैसे इससे बच सकते हैं। हमारे शास्त्रों में जितने भी हमारे प्ररेणा सोत्र हैं, सभी ने अपने माता-पिता का आदर सत्कार किया व आम जन को एक संदेश दिया कि मां-बाप की सेवा ही ईश्वरी सेवा है। भगवान श्रीराम ने माता के कहने पर 14 वर्ष के वनवास में चले गये। हनुमान जी सदा अपनी माता अंजली की पूजा करते रहें। श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता की सेवा कर अमरता का वरदान पाया। लव-कुश ने माता सीता की अराधना की। पांडवों ने भी सदा अपनी माता का आदर सत्कार कर उनसे आश्ीर्वाद प्राप्त कर कौरवों पर विजय प्राप्त की। इस प्रकार हम गणपति जी को अपना प्रेरणा सोत्र मानकर गणेश चर्तुदशी को संकल्प ले कि हम भी गणपति जी की तरह ही अपने माता-पिता की आदर सत्कार करते रहेंगे व उसके बाद ही गणपति पूजा कर उनकी अनुकंपा प्राप्त करेगें।

- अवतोष शर्मा (स्वतंत्र पत्रकार)

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