तीर्थ स्थल: आस्था और श्रद्धा का प्रतीक है देवघर

तीर्थ स्थल: आस्था और श्रद्धा का प्रतीक है देवघर

यूँ तो पूरा भारत ही आस्था, श्रद्धा और विश्वास का एक मुख्य केंद्र है। यहाँ मंदिरों,मस्जिदों,गुरुद्वारों और गिरजाघरों के ऐतिहासिक भवन व स्थल हैं जहाँ साल भर सैलानियों और श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है। इसी क्रम में अगर देवघर का नाम लिया जाये तो अनायास ही मन श्रद्धा एवं भक्तिभाव से भर जाता है।

झारखण्ड स्थित देवघर का नाम आज विश्व-फलक पर अंकित है। यहाँ का सबसे महत्त्वपूर्ण आस्था का केंद्र है वैद्यनाथ मंदिर। भगवान शंकर का यह मंदिर ऐतिहासिक तो है ही,यहाँ के चप्पे चप्पे में एक अद्भुत आकर्षण है। इसी आकर्षण और आस्था से वशीभूत होकर मैं निकल पड़ा देवघर की यात्रा पर। यह यात्र मेरे लिए एक आम यात्रा न होकर उल्लेखनीय एवं यादगार यात्रा बन गई।

जसीडीह रेलवे स्टेशन पहुंचकर मैं सीधे निकल पड़ा देवघर के वैद्यनाथ मंदिर की ओर। स्टेशन से मंदिर जाने के लिए टैक्सी और आटोरिक्शा की व्य्वसथा है। इनके सहारे आप आसानी से मंदिर तक पहुँच सकते हैं।

वैद्यनाथ मंदिर

देवघर का वैद्यनाथ मंदिर विश्वप्रसिद्ध तीर्थ-स्थल है। पूजा-सामग्रियों से भरी दुकानों को पार करते हुए शिव मंदिर के मुख्य-द्वार पर पहुँचते ही तन-मन में एक असीम श्रद्धा का संचार होने लगता है। इसी असीम श्रद्धा से वशीभूत होकर मैंने अंदर की तरफ कदम बढ़ाया तो देखा कि मंदिर में भक्ति भाव की अद्भुत गंगा बह रही है। इसी बीच शीश झुकाकर मैंने मंदिर परिसर में मौजूद भोले बाबा सहित समस्त देवताओं को प्रणाम किया। इसके बाद मुझे मिल गये मंदिर के ही एक पुजारी। पुजारियों को यहाँ 'पंडाÓ कहते हैं। मंदिर के आस पास पंडा परिवारों की काफी आबादी है। ये लोग मंदिर की सेवा में लगे रहते हैं। पंडा जी ने बताया कि इस मंदिर की महिमा अपरम्पार है। यहाँ अगर सच्चे दिल से कुछ मांगेंगे तो ईश्वर की कृपा से जरूर पूरी होती है। इस मंदिर को वैद्यनाथ धाम के नाम से भी जाना जाता है। चूँकि यहाँ भगवान शिव के अलावा समस्त देवताओं का वास है इसलिए इसे 'देवघर' का नाम दिया गया है। यहाँ ज्योतिर्लिंग स्थापित है, इस कारण इस स्थान का विशेष महत्त्व भी है। इस लिंग को श्रद्धालु 'कामना लिंग' कहकर भी बुलाते है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ हर मनोकामना पूरी होती है। पंडा जी ने बताया कि यह ज्योतिर्लिंग वास्तव में सिद्धपीठ है।

कैसे हुयी ज्योतिर्लिंग की स्थापना?

देवघर के ज्योतिर्लिंग यानी सिद्धपीठ की स्थापना को लेकर एक रोचक इतिहास है। कहा जाता है कि शिव को प्रसन्न करने हेतु राक्षसराज रावण हिमालय पहुंचे और घोर तपस्या में लीन हो गए। घोर तपस्या के बाद राक्षसराज रावण ने अपने मस्तक काटने शुरू कर दिए और शिवलिंग पर चढ़ाने लगे । चूँकि रावण के दस मस्तक थे इसलिए एक-एक कर सारे मस्तक शिवलिंग पर चढऩे लगे । देखते-ही देखते दस सिर वाले राक्षसराज ने अपने नौ मस्तक शिवलिंग पर चढ़ा डाले तो दयालु भोलेबाबा प्रकट हो गए और दसवां सिर काटने से रोकते हुए कहा- 'बस करो वत्स। तुम्हारी घोर तपस्या और भक्ति-भाव से मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ। भगवान शिव के इतना बोलते ही रावण के सारे कटे सिर पुन: जुड़ गए और वह पहले की तरह हो गए।

उन्होंने शिव को साष्टांग दण्डवत किया और कहा - प्रभु ,मैं हिमालय में स्थापित आपके इस लिंग को लंका ले जाकर स्थापित करना चाहता हूँ । इसपर भोलेबाबा ने मुस्कुराते हुए रावण को शिवलिंग लंका ले जाने की आज्ञा दे दी। इस आज्ञा से शिव भक्त रावण अत्यन्त प्रसन्न हुआ। तभी शिव जी ने एक चेतावनी भी दे डाली कि-इस शिवलिंग को यदि मार्ग में कहीं रख दिया गया तो यह वहीं अचल हो जायेगा। फिर इसे कहीं और ले जाना मुश्किल होगा। यह कहकर शिव अंतर्ध्यान हो गए और रावण शिवलिंग लेकर चल पड़े।

रास्ते में रावण को लघुशंका का अहसास हुआ तो उन्होंने शिवलिंग एक ग्वाले को थमा दिया और खुद लघुशंका के लिए चले गए। दरअसल यह स्थान एक चिताभूमि थी। रावण को लघुशंका से लौटते -लौटते काफी देर हो गयी। इधर ग्वाले ने शिवलिंग को भूमि पर रख दिया। वापस आकर रावण ने शिवलिंग को उखाडऩे का हर सम्भव प्रयास किया। पूरी ताकत झोंक दी मगर शिवलिंग टस-से-मस नहीं हुआ। रावण निराश हो गए। उन्होंने शिवलिंग पर पांवों के पैर का अंगूठा गड़ाया और थक-हार कर लंका चले गए। इधर देवताओं ने आकर शिवलिंग की पूजा-अर्चना की और उसे वहीं पूरे विधि-विधान के साथ प्रतिस्थापित कर दिया। इसके बाद शिव की स्तुति करते हुए सभी स्वर्ग को चले गए। यही स्थान आज देवघर है।

ऐसी मान्यता है कि यहाँ साक्षात् शिव हैं इसलिए यहाँ आकर शिव की आराधना और जलाभिषेक करने से हर मनोकामना पूरी होती है। यही वजह है कि सिर्फ श्रावण माह में ही नहीं बल्कि साल भर यहाँ शिव-भक्तों और श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है। यहाँ भोले बाबा का भव्य मंदिर है और पास ही मां पार्वती सहित अनेक देवी-देवताओं के मंदिर भी हैं लेकिन सबसे प्राचीन शिव-मंदिर ही हैं। प्रत्येक वर्ष यहाँ श्रावणी -मेला लगता है जिसमें देश के कोने-कोने से श्रद्धालु 'बोल बम' का नारा लगाते हुए पहुँचते हैं एवं ज्योतिर्लिंग पर जलाभिषेक करते हैं।

श्रद्धालुओं की कांवड़-यात्रा

सावन का पवित्र महीना शुरू होते ही श्रद्धालु बाबा के दर्शन को यहाँ पहुंचने लगते हैं। ज्यादातर श्रद्धालु कांवड़ लेकर यहाँ तक आते हैं। इनकी पवित्र यात्रा शुरू होती है सुल्तानगंज से। श्रद्धालु गंगा- जल लेकर पैदल देवघर के लिए 'बोल-बम' के नारे के साथ प्रस्थान करते हैं। कांवड़ में जल लेकर चलते समय ये ध्यान रखा जाता है कि पात्र भूमि से न सटे। सौ किलोमीटर की कठिन यात्रा के बाद कांवडिय़े देवघर पहुँचते हैं और यहाँ शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं। इस दौरान श्रद्धालुओं के अपने में छाले पड़ जाते हैं लेकिन जलाभिषेक के बाद असीम शांति मिलती है और श्रद्धालु अपना दर्द भूल जाते हैं। प्रत्येक वर्ष सावन के महीने में यहाँ श्रावण -मेले का आयोजन किया जाता है जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुँचते हैं। मंदिर के निकट एक तालाब भी है जो आकर्षण का केंद्र है। वैद्यनाथ धाम में पंचशूल की पूजा की जाती है। दरअसल भारत में 12 ज्योतिर्लिंग हैं जिनमें देवघर स्थित वैद्यनाथ मंदिर शामिल है। आमतौर पर विश्व के सभी शिव मंदिरों के ऊपर त्रिशूल लगा रहता है मगर यहाँ त्रिशूल की बजाय आपको शिव मंदिर के शीर्ष पर पंचशूल दिखेगा। सिर्फ शिव भगवान ही नहीं बल्कि आस-पास के सभी मंदिरों के ऊपर पंचशूल लगे हैं। पुजारी ने बताया कि महाशिवरात्रि से 2 दिनों पहले सभी मंदिरों से पंचशूल उतारे जाते हैं और इसे स्पर्श करने के लिए श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है। कहते हैं इस पंचशील का स्पर्श भी अपने आप में काफी अद्भुत है। इसी दौरान पंचशूलों की पूजा पूरे विधि-विधान से की जाती है। इसके बाद सभी पंचशूलों को यथास्थान लगा दिया जाता है। इस बीच भगवान शिव एवम पार्वती मंदिर के गठबंधन को बदल दिया जाता है। मंदिर में प्रवेश करते ही आप देख सकते हैं शिव और पार्वती मंदिर के गठबंधन को। दूर से ही यह नजारा भक्तों को मंत्रमुग्ध करता है। हर वर्ष महाशिवरात्रि के दिन यह गठबंधन बदला जाता है। पुराने गठबंधन के कपड़े का एक छोटा सा अंश प्राप्त करने के लिए भी भक्तों की भीड़ लगी रहती है। कहा जाता है कि इसे घर में रखने से सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।

बैजू मंदिर-मंदिर से पश्चिम दिशा में तीन और मंदिर भी हैं। बैजू मंदिर के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर देवघर बाजार में हैं। यहाँ तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। यहाँ के तीनों मंदिरों में शिवलिंग स्थापित किया गया है। बताया जाता है वैद्यनाथ मंदिर के पुजारियों के पूर्वजों ने ही इन मंदिरों की स्थापना की थी।

बासुकीनाथ मंदिर

देवघर जाकर अगर वैद्यनाथ मंदिर के बाद बासुकीनाथ मंदिर के दर्शन नहीं किए तो आपकी यात्रा बेकार है। देवघर के वैद्यनाथ मंदिर से महज 42 किलोमीटर दूर स्थित है यह मंदिर। इस मंदिर तक पहुँचने के लिए बसें एवम चारपहिया वाहन भी उपलब्ध हैं। वाहन की मदद से बासुकीनाथ बाबा के भव्य मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। इस मंदिर की छटा भी काफी निराली है। यहाँ आकर चित्त को असीम शांति मिलती है। जरमुंडी गांव के समीप स्थित इस मंदिर में आप बासुकीनाथ बाबा का दर्शन कर सकते हैं। साथ ही कई और देवताओं की मनोहारी मूर्तियां यहाँ विद्यमान हैं। आप-पास कई छोटे-बड़े मंदिर हैं। इस मंदिर के इतिहास को नौनिहाल के घाटवाल से जोड़ा जाता है।

नवलखा मंदिर

देवघर के बाहरी हिस्से में स्थित नवलखा मंदिर भी इस शहर का अभिन्न अंग है। राधाकृष्ण को समर्पित इस मंदिर का निर्माण रानी चारुशीला ने करवाया था। मंदिर का कलेवर काफी आकर्षक है। उत्कृष्ट वस्तु एवम स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना है ये मंदिर। कहा जाता है रानी चारुशीला ने बालानंद ब्रह्मचारी के एक शिष्य के साथ मिलकर नौ लाख रूपये की लागत से बनवाया था। वैद्यनाथ मंदिर से महज डेढ़ किलोमीटर दूर नवलखा मंदिर वेलूर के रामकृष्ण मंदिर से मिलता-जुलता है। इसके दर्शन मात्र से चित्त प्रसन्न हो जाता है।

नंदन हिल्स

वैद्यनाथ धाम और नवलखा मंदिर के दर्शन के बाद अगला पड़ाव था सुन्दर नंदन हिल्स। देवघर से पश्चिम दिशा की ओर यह एक मनोहारी पर्यटन-स्थल है। यहाँ पहाड़ पर है एक शिव और नंदी मंदिर। पहाड़ के ऊपर पहुंचकर इन दोनों मंदिरों के दर्शन किये जा सकते हैं। यहाँ भी भक्तों की भीड़ लगी रहती है। नंदन हिल्स पर चढ़कर आप शहर का मनोरम दृश्य देख सकते हैं। बच्चों के लिए भी यह काफी आकर्षक स्थान है। यहाँ पर्यटन विभाग की ओर से पार्क का निर्माण कराया गया है। साथ ही बूट घर,भूत घर और दर्पण घर भी हैं जिसका आनंद बच्चे उठा सकते हैं। नौका विहार और झूले का आनंद भी लिया जा सकता है।

त्रिकूट हिल्स

देवघर की यात्र त्रिकूट हिल्स के बिना अधूरी है। देवघर से दस किलोमीटर दूर स्थित है त्रिकुटाचल यानी त्रिकूट हिल्स। यह स्तंभ भी शिव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ शिव का मंदिर 2470 फुट ऊपर त्रिकूट पर्वत पर है। यहाँ तीन मुख्य चोटियां हैं ,यही वजह है कि इसका नाम त्रिकूट हिल्स पड़ा। यहाँ पहुंचकर नैसर्गिक आनंद प्राप्त कर सकते हैं आप। पहाडिय़ों के बीचोंबीच एक आश्रम भी है-त्रिकुटाचल आश्रम।

इस आश्रम की स्थापना संपदानंद देव ने की थी। बाद में उनके अनुयायिओं ने इसकी देखभाल करनी शुरू की और आज भी इसका सफलतापूर्वक इसका संचालन किया जा रहा है। यहाँ देवी त्रिशूली की एक वेदी भी है। पहाडिय़ों पर चढऩे के लिए आटोमैटिक झूले लगाए गए हैं। इसपर चढऩा किसी रोमांच से काम नहीं है। कुल मिलाकर बहुत ही दर्शनीय स्थल है यह। यहाँ बंदरों के भी दर्शन किये जा सकते हैं।

कुल मिलाकर मेरी देवघर यात्रा काफी रोमांचकारी एवम यादगार रही।

- संजय सिन्हा

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