शुक्ल सप्तमी पर स्नान करने से होती है मोक्ष की प्राप्ति

शुक्ल सप्तमी पर स्नान करने से होती है मोक्ष की प्राप्ति



कमोदा तीर्थ पर 16 को लगेगा शुक्ला सप्तमी मेला

कुरुक्षेत्र। गांव कमोदा के श्री काम्यकेश्वर महादेव मंदिर एवं तीर्थ पर सावन माह की 16 सितम्बर को रविवारीय शुक्ला सप्तमी मेला आयोजित होगा। कहा जाता है कि तीर्थ में शुक्ला सप्तमी के शुभ अवसर पर स्नान करने से मोक्ष प्राप्त होती है। ग्रामीणों ने मेले की तैयारियां आरंभ कर दी हैं। तीर्थ में स्वच्छ जल भरा जा रहा है तो मंदिर की साफ-सफाई करने के साथ रंगाई-पुताई भी की जा रही है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार रविवारीय शुक्ल सप्तमी के दिन तीर्थ में स्नान करने से मोक्ष व पुत्र रत्‍‌न की प्राप्ति होती है। महर्षि पुलस्त्य जी और महर्षि लोमहर्षण जी ने वामन पुराण में का यकवन तीर्थ की उत्पति का वर्णन करते हुए बताया कि इस तीर्थ की उत्पति महाभारत काल से पूर्व की है। एक वार नैमिषारण्य के निवासी बहुत ज्यादा संख्या में कुरुक्षेत्र की भूमि के अंतर्गत सरस्वती नदी में स्नान करने हेतु का युवक वन में आए थे। वे सरस्वती में स्नान न कर सके। उन्होंने यज्ञोपवितिक नामक तीर्थ की कल्पना की और स्नान किया| फिर भी शेष लोग उस में प्रवेश न पा सके| तब से मां सरस्वती ने उनकी इच्छा पूर्ण करने के लिए साक्षात कुंज रूप में प्रकट होकर दर्शन दिए और पश्चिम-वाहनी होकर बहने लगी। इससे स्पष्ट होता है कि काम्यकेश्वर तीर्थ एवं मंदिर की उत्पति महाभारत काल से पूर्व की है।

वामन पुराण के अध्याय 2 के 34 वें श्लोक में काम्यकेश्वर तीर्थ प्रसंग में स्पष्ट लिखा है कि रविवार को सूर्य भगवान पूषा नाम से साक्षात रूप से विद्यमान रहते हैं। इसलिए वनवास के समय पांडवों ने इस धरा को तपस्या हेतु अपनी शरणस्थली बनाया। द्यूत-क्रीड़ा में कौरवों से हारकर अपने कुल पुरोहित के साथ 10 हजार ब्राह्मणों के साथ यहीं रहते थे। उनमें 1500 के लगभग ब्राह्मण श्रोत्रिय-निष्ठ थे जो प्रतिदिन वैदिक धर्मानुष्ठान एवं यज्ञ करते थे।

ग्रामीण सुमिंद्र शास्त्री ने बताया कि मंदिर में 16 सितम्बर को रविवारीय शुक्ला सप्तमी मेला लगेगा। उनके अनुसार इसी पावन धरा पर पांडवों को सांत्वना एवं धर्मोपदेश देने हेतु महर्षि वेदव्यास जी, महर्षि लोमहर्षण जी, नीतिवेता विदुर जी, देवर्षि नारद जी, वृहदश्र्व जी, संजय एवं महर्षि मार्कण्डेय जी पधारे थे। इतना ही नहीं द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण धर्मपत्‍‌नी सत्यभामा के साथ पांडवों को सांत्वना देने पहुंचे थे। पांडवों को दुर्वासा ऋषि के श्राप से बचाने के लिए और तीसरी बार जयद्रथ द्वारा द्रोपदी हरण के बाद सांत्वना देने के लिए भी भगवान श्रीकृष्ण काम्यकेश्वर तीर्थ पर पधारे थे।

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