पर्यटन/तीर्थस्थल: जहां सशरीर विराजित हैं मां विंध्यवासिनी

पर्यटन/तीर्थस्थल: जहां सशरीर विराजित हैं मां विंध्यवासिनी

विंध्य पर्वत पर विराजमान आदिशक्ति माता विन्ध्यवासिनी की महिमा अपरम्पार है। इनके गुणों का बखान देवताओं ने भी किया है। भक्तों का कल्याण करने के लिए सिद्धपीठ विंध्याचल में सशरीर विराजित माता विंध्यवासिनी का धाम मणिद्वीप के नाम से विख्यात है। मां के धाम में दर्शन-पूजन करने से भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

विंध्य पर्वत की विशाल श्रंखला को विंध्याचल में ही पतित पावनी आदि गंगा स्पर्श करती हैं। इसी स्थान पर आदिशक्ति माता विंध्यवासिनी अपने पूरे शरीर के साथ विराजमान हैं जबकि देश के अन्य शक्ति पीठों पर सती के शरीर का एक-एक अंग गिरा है। देश के तमाम स्थानों पर शक्तिपीठ हैं तो विंध्याचल सिद्धपीठ के नाम से जाना जाता है। यहां माता अपने तीनों रूप महालक्ष्मी, महाकाली व महासरस्वती के रूपों में तीन कोण पर विराजमान होकर दर्शन देती हैं।

तीनों देवियों के त्रिकोण के केन्द्र में भगवान शिव विराजमान हैं। विंध्यक्षेत्र को शिव शक्तिमय बनाकर मां भक्तों का कल्याण करती हैं। माता के त्रिकोण का दर्शन व परिक्रमा का विशेष माहात्म्य पुराणों में किया गया है। देश के कोने-कोने से आने वाले भक्त मातारानी के दर पर मत्था टेकते हैं। ऋषियों-मुनियों के लिए सिद्धपीठ आदिकाल से सिद्धि पाने के लिए तपस्थली रहा है। देवासुर संग्राम के दौरान ब्रह्मा, विष्णु व महेश ने माता के दरबार में तपस्या कर जगत के कल्याण का वरदान मांगा था। सिद्धपीठ विंध्यांचल की महिमा अनंत है। विंध्य पर्वत की विशाल श्रंखला को विंध्याचल में ही पतित पावनी गंगा स्पर्श करती हैं। माता के धाम में पहुंचने वाले भक्त गंगा की पावन धारा में स्नान करके माता के धाम में दर्शन-पूजन करते हैं।

गंगा नदी के तट पर शिवपुर नामक स्थान पर मर्यादा पुरूषोत्तम राम ने अपने पिता दशरथ का पिंडदान करने के बाद भगवान शिव की स्थापना कर विधिवत् पूजन-अर्चन किया गया था। राम द्वारा स्थापित विशाल शिवलिंग अपने सम्पूर्ण गुणों के साथ विराजमान विंध्य की महिमा बढ़ा रहे हैं। रामेश्वरम् महादेव का दर्शन करने से शिवधाम की प्राप्ति होती है, ऐसा जानकारों का मानना है।

सिद्धपीठ विंध्याचल आदिकाल से ऋषियों-मुनियों के लिए तपस्थली रहा है। माता की आराधना तंत्र व मंत्र क्रिया से करने वाले साधकों का जमावड़ा हर नवरात्र में लगता है। माता की

पंचोपचार विधि से पूजा की जाती है। आदिशक्ति माता विंध्यवासिनी देवी विंध्यधाम में अपने तीन रूपों महालक्ष्मी, महाकाली व महासरस्वती के रूपों में तीन कोण पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देतेे हुए उनका कल्याण कर रही हैं।

माता विंध्यवासिनी मणिद्वीप में विराजमान हैं। इनके सर्वांग की पूजा की जाती है जबकि अन्य पीठों में इनके अंग की पूजा की जाती है। पुराणों में भी विंध्य क्षेत्र की महिमा का बखान किया गया है। गौर करें तो देश के तमाम मंदिरों में माता काली के सौम्य रूप का दर्शन मिलता है जबकि विंध्य पर्वत पर विराजमान भक्तों को अभय प्रदान करने वाली माता काली के दिव्य रूप का दर्शन मिलता है। बताया जाता है कि देवता देवासुर संग्राम में भयभीत होकर आदिशक्ति के शरण में आये। उनकी करूण पुकार सुनकर माता ने रक्तासुर का वध करने के लिए अपना खड्ग और खप्पर उठा लिया। रक्तासुर का रक्त धरती पर पड़ते ही असुरों की फौज पैदा हो जा रही थी, तब देवी ने अपने मुंह को विशाल आकार दिया। दोनों डाढ़ें फैलाकर नीचे वाले को धरती व उपर के हिस्से को आसमान से सटा दिया और देवी ने अपनी जिह्वा निकालकर रक्तासुर के रक्त का पान कर उस दुष्ट का वध किया। उसी रूप में कालीखोह में विराजमान माता काली के इस रूप का दर्शन करने से शत्रु पराजित होते हैं।

ऋषियों-मुनियों के लिए सिद्धपीठ आदिकाल से सिद्धि पाने के लिए तपस्थली रहा है। देवासुर संग्राम के दौरान ब्रह्मा, विष्णु व महेश ने माता के दरबार में तपस्या कर वरदान पाया। सिद्धपीठ में भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। मार्कडेय पुराण में देवी की महिमा का बखान करते हुए कहा गया है कि 'यं यं चिन्त्यते कामं तं तं प्राप्नोति सर्वदा...', भक्त जैसे-जैसे माता की आराधना करता है वैसे उसकी मनोकामनाएं सिद्ध होने लगती हैं। विंध्य क्षेत्र की महिमा अपरम्पार है जिसका वर्णन देवता भी नहीं कर पाए हैं।

- संतोष देवगिरी

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