मंत्र-रहस्य: परम सत्य की खोज में जुटा ज्योतिष

मंत्र-रहस्य: परम सत्य की खोज में जुटा ज्योतिष

एक जमाना था जब 'ज्योतिष' भी एक विज्ञान हुआ करता था। महर्षि पाराशर, म. जैमिनी, म. वशिष्ट, आर्यभट्ट महर्षि व्यास और वराहमिहिर, जयदेव, नीलकंठ जैसे वैज्ञानिक और अनुसंधानकर्ता जब तक ज्योतिष से जुड़े रहे, तब तक ज्योतिष एक विज्ञान रहा परन्तु जब से 'ज्योतिषÓ अधकचरे दिमाग वाले शैतान, धूर्त, पाखंडी और धन लोलुप लोगों के पास आया है जो तरह-तरह के भय दिखाकर और तरह-तरह के हथकण्डे अपनाकर जनसाधारण को लूट रहे हैं और येन केन प्रकारेण अपने स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं, तब से ज्योतिष न तो 'विज्ञान' रह गया और न ही 'कला'।

जो विद्या अपना वैज्ञानिक पक्ष और आधार प्रस्तुत नहीं कर पाती, वह विद्या अथवा विषय समाज से अलग-थलग पड़ जाते हैं। अवैज्ञानिक और आधारहीन विषयों, विद्याओं में कोई बुद्धिमान व्यक्ति भला क्यों आस्था दर्शाये? अगर ज्योतिष वास्तव में भविष्य को जानने का विज्ञान है तो इसके नियम सभी चर-अचर प्राणियों पर लागू होने चाहिए परन्तु ऐसा नहीं हो पा रहा है। क्यों? क्योंकि प्राचीन और मध्यकालीन ज्योषिण आचार्यों के बनाये नियमों, सिद्धान्तों को वर्तमान में इतना अधिक गड्ड-मड्ड कर दिया गया है कि ज्योतिषी समझ ही नहीं पाता कि कौन सा नियम अथवा सिद्धान्त कब कैसे लागू करे कि सही और सटीक परिणाम ही सामने आये। अत: ज्योतिष मात्र तीर-तुक्का बन कर रहा गया है।

एक होती है भविष्यवाणी, एक होती है वर्तमान-वाणी अर्थात वर्तमान के बारे में जानकारी देना और एक होती है भूतकाल-वाणी यानी भूतकाल की जानकारी देना। भूतकाल को अत्यधिक महत्व न देकर ज्योतिषी को वर्तमान और भविष्य के बारे में ही सोचना चाहिए। कहा जाता है कि 'भाग्य मात्र' कर्मो की चरम परिणति है अर्थात जैसे-जैसे कर्म हम करते चले जायेंगे, वैसा-वैसा बनता, बदलता चला जायेगा। अच्छे भाग्य और अच्छे भविष्य हेतु अच्छे कर्मों की ओर ज्योतिषी प्रेरित तो कर सकता है परन्तु अच्छे कर्म करना अथवा न करना जातक के अपने हाथ में होता है या फिर प्रकृति के हाथ में।

ज्योतिषी का प्रमुख कार्य है ब्रह्माण्ड में विभिन्न ग्रहों एवं नक्षत्रों की स्थिति एवं गति को जानना, ग्रहों एवं नक्षत्रों की विभिन्न स्थितियों एवं गति के योग से भविष्य में निकलने वाले प्रभावों, परिणामों का आकलन करना। ज्योतिष का संबंध केवल पृथ्वी और उस पर बसने वाले प्राणी मात्र के साथ ही नहीं बल्कि संपूर्ण ब्रह्माण्ड की समस्त गतिविधियों के साथ है। भौतिक, जीव एवं खगोल विज्ञान के अनुसंधान एवं अन्वेषण कार्य प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से ज्योतिष से जुड़े हुये हैं। पर्यावरण में आने वाले परिवर्तनों, प्राकृतिक आपदाओं तथा मानव जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव की पूर्ण जानकारी देना ज्योतिषी का कार्य है। आज ज्योतिष को विज्ञान का दर्जा नहीं मिल पा रहा है? कारण स्पष्ट है। अगर किसी तालाब का पानी दस-बीस बरस तक न बदला जाये तो उस पानी में काई जम जाती है। पानी इतना गन्दला हो जाता है कि वह पीने या नहाने योग्य नहीं रहता। सतत गतिशीलता प्रकृति का नियम है। समय के साथ-साथ यदि ज्योतिष में रचनात्मक गतिशीलता बनी रहती तो ज्योतिष भी आज विज्ञान ही होता।

अगर हमें ज्योतिष को विज्ञान बनाना है तो गड्ड मड्ड हो चुके सामान्य नियमों तथा सिद्धांतों का पुनर्मूल्यांकन करना होगा। कपोल कल्पनाओं, पाखंडों और अन्धविश्वासों को ज्योतिष से अलग-थलग करना होगा। प्राचीन एवं मध्यकालीन ज्योतिष ग्रन्थों की मात्र समीक्षा, पुनर्समीक्षा और पुनर्समीक्षा की समीक्षा करते चले जाने से ही बात नहीं बनेगी। कुछ न कुछ नया सृजन तो करना ही पड़ेगा। मात्र नकल के सहारे कब तक गाड़ी खींची जा सकती है? पश्चिमी राष्ट्रों और अब पूर्व में भी में ज्योतिष के नाम पर अजीबो-गरीब किस्म के कई खेल-तमाशे पनपे हैं। ताश द्वारा भविष्य जानिये, पर्चियों द्वारा भविष्य पढिय़े, तोते या पशुओं द्वारा भविष्य जानिये वगैरह-वगैरह। ज्योतिष सुनिश्चित भविष्य बताने का विज्ञान है तो फिर ये सट्टेबाजों वाले खेल इसमें कहां से आ जुड़े। और तो और, इन खेल-तमाशों द्वारा निकाले गये अनुमानों अथवा परिणामों को लोकप्रिय समाचार पत्रों/पत्रिकाओं में भी जगह मिलने लगी है। ऐसे में ज्योतिष को विज्ञान का दर्जा भला कैसे मिलेगा? समय आ गया है जब हमें ज्योतिष में घुसे अवैज्ञानिक नियमों, सिद्धान्त और अप्रासंगिक हो चुकी प्रक्रियाओं को निकाल बाहर करना होगा क्योंकि परम-सत्य तक सटीक और वैज्ञानिक नियमों द्वारा ही पहुंचा जा सकता है।

- पंडित राजेशकुमार 'भार्गव'

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