पतालेश्वर नाम से विख्यात है ये मंदिर, शिवलिंग में होते हैं चमत्कार

पतालेश्वर नाम से विख्यात है ये मंदिर, शिवलिंग में होते हैं चमत्कार



-यमुना किनारे इस मंदिर में सावन में शिवलिंग के दर्शन करता है नाग

हमीरपुर । उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में यमुना नदी के किनारे बना मंदिर मराठाकालीन है, जो पतालेश्वर मंदिर के नाम से विख्यात है। कुछ दशक पहले यमुना और बेतवा नदियों की भीषण बाढ़ में पूरी तरह से यह मंदिर डूब गया था फिर भी मंदिर अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ। कई दिनों तक बाढ़ के पानी में मंदिर के डूबे रहने के बाद दीवालों का प्लास्टर तक भी उखड़ा। इस मंदिर में बहुत पुराना नाग रहता है जो सावन के महीने में रोज शिवलिंग से लिपटता है। इस मंदिर में गुरुवार को भक्तों का सैलाब दर्शन के लिये उमड़ा। मंदिर की लौकिक शक्ति से प्रभावित होकर स्थानीय लोगों ने मंदिर व उससे लगे क्षेत्र को विकास के नये आयाम दिये हैं।

हमीरपुर शहर में यमुना और बेतवा नदी के बीच बसे इस पतालेश्वर मंदिर का निर्माण मराठा काल में हुआ था। इसका गुंबद और मठ इतना मजबूत है कि दो साल पहले 20 फीट दूर जमीन पर गिरी आकाशीय बिजली की धमक से कोई असर नहीं पड़ा था, जबकि आसपास के रिहायशी मकानों की दीवाले दरक गयी थीं। पांच सौ मीटर की दूरी में रिहायशी घरों में लगे बिजली के उपकरण और महंगे सामान तक आकाशीय बिजली की तेज आवाज से क्षतिग्रस्त हो गए थे। अंग्रेजी हुकूमत के समय मंदिर में अंग्रेज अफसर दर्शन करने आते थे। हमीरपुर के सहदेव और सतीश तिवारी ने बताया कि वर्ष 1978 व 1983 में यमुना बेतवा नदी में भीषण बाढ़ आयी थी तब यमुना नदी किनारे बसा पतालेश्वर मंदिर डूब गया था। कई दिनों तक बाढ़ के पानी में मंदिर डूबा रहा लेकिन मंदिर की दीवाले टस से मस तक नहीं हुयी थी। 1983 के बाद भी कई बार यमुना नदी उफनायी तो इस मंदिर में बाढ़ का पानी घुस गया था। पुजारी बाबा को भी ऊंचाई वाले स्थान पर भागकर शरण लेनी पड़ी थी। यहां के डा.दिलीप त्रिपाठी, पंडित सुरेश कुमार मिश्रा व संतोष बाजपेई ने बताया कि सावन में पतालेश्वर मंदिर में शिवलिंग से एक नाग लिपटता है। उसे सब लोगों ने पूजा करते समय देखा मगर नाग ने किसी को हानि नहीं पहुंचायी। यह नाग भी बहुत पुराना है जो शिवलिंग के दर्शन करने रोज आता है। मंदिर के पुजारी का कहना है कि इस मंदिर में कोई भी रात में नहीं रुक सकता है क्योंकि रात में मंदिर में लौकिक शक्तियों से पूरा मंदिर प्रकाशमय हो जाता है।

इतिहासकार डॉ. भवानीदीन का कहना है कि यह सभी मंदिर मराठा काल में बनवाया गया था। यमुना नदी किनारे होने के कारण इन शिवालयों में मीलों दूर से लोग दर्शन करने आते हैं। इस मंदिर में कोई पुजारी साल भर तक नहीं ठहर सकता है। शुरू में एक भगत बाबा नाम के पुजारी मंदिर में रहते थे जो मरते दम तक शिवलिंग की पूजा करते थे। उनकी समाधि मंदिर परिसर में बनायी गयी है। सावन के तीसरे सोमवार को यहां हवन पूजन और श्रृंगार के लिये कार्यक्रम की तैयारी भी शुरू कर दी गयी है।


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