पर्यटन/धर्मस्थल: श्रद्धा का केन्द्र - हजूर साहिब, नांदेड़

पर्यटन/धर्मस्थल: श्रद्धा का केन्द्र - हजूर साहिब, नांदेड़

कहा जाता है कि जब गुरु गोबिंदसिंह जी के अपने पिता और चारों बेटे देशधर्म के लिए शहीद हो गए, तब वे लोकहित में गोदावरी नदी के किनारे बसे नगर नांदेड़ पहुँचे। नांदेड़ में गुरुजी ने लीलाएँ रची। यहाँ आपने गुरुद्वारा नगीना घाट से तीर चलाकर पूर्व गुरुओं के समय का तप-स्थान प्रगट किया। तीर एक मस्जिद में जा लगा, जहाँ ढाई हाथ जमीन खोदकर सतयुगी आसन, करमंडल, खड़ाऊ और माला निकाली और वह स्थान प्रगट किया। बदले में उस जमीन के मालिक मुस्लिम को उस स्थान पर सोने की मोहरें बिछाकर दी गई।

इस स्थान के प्रगट होने पर यहाँ गुरुजी रोज नई-नई लीलाएँ करने लगे। सुबह-शाम दीवान सजने लगे। चारों तरफ आनंदमयी रौनक बढ़ गई। कुछ ही समय बाद सूबा सरहद के नवाब वजीर खान के भेजे कातिलों के हमले के बाद गुरु जी ने सचखंड गमन की तैयारी की तो अति व्याकुल संगत के पूछने पर आपने विक्र मी संवत 1765 कार्तिक सुदी दूज (4 अक्टूबर 1708) के दिन पाँच पैसे और नारियल श्रीगुरु ग्रंथ साहिब जी के सम्मुख रख, माथा टेककर श्रद्धा सहित परिक्र मा की और इस पावन दिन समूह सिख संगत को साहिब श्रीगुरु ग्रंथ साहिब जी से जोड़कर और युग-युगों तक अटल गुरु गद्दी अर्पण की। इस तरह श्रीगुरु ग्रंथ साहिब को गुरु गद्दी देकर दीवान में बैठी संगत को फरमाया -

आगिआ भई अकाल की तवी चलाओ पंथ।।

सब सिखन को हुकम है गुरु मानियो ग्रंथ।।

गुरु ग्रंथ जी मानियो प्रगट गुरां की देह।।

जो प्रभ को मिलबो चहै खोज शब्द में लेह।।

इसके बाद गुरु साहिब ने सर्वत्र खालसा सिख संगत को भविष्य का मार्ग दिखाया। युगों युग की इस पावन पवित्र हुई धरती का नाम श्री अबचलनगर हुआ। इस तरह जगत तमाशा देखने के बाद विचित्र नाटक खेलते हुए संवत 1765 कार्तिक सुदी पंचमी के दिन आप परम पुरख परमात्मा में अभेद हो गए।

नांदेड़ दक्कन के पठार में गोदावरी नदी के तट पर बसा महाराष्ट्र का एक प्रमुख शहर है। नंदा तट के कारण इस शहर का नाम नांदेड़ पड़ा। सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व में नंदा तट मगध साम्राज्य की सीमा थी। प्राचीन काल में यहां सातवाहन, बादामी के चालुक्यों, राष्ट्रकूटों और देवगिरी के यादवों का शासन था। मध्यकाल में बहमनी, निजामशाही, मुगल और मराठों ने यहां शासन किया जबकि आधुनिक काल में यहां हैदराबाद के निजामों का अधिकार था जिसे विरूद्ध स्वामी रामानंद तीर्थ ने सत्याग्रह कर इसें मुक्त करवाया। इस तरह इस स्थान को आजादी 1947 के पश्चात ही मिली। आज स्वामी रामानंद तीर्थ की स्मृति को समर्पित विश्वविद्यालय भी है। वैसे प्राचीन काल में यह शहर वेदांत की शिक्षा, शास्त्रीय संगीत, नाटक, साहित्य और कला का प्रमुख केन्द्र था।

इस गुरुस्थान में अपार जनसमूह की श्रद्धा देखते ही बनती है। भारी भीड़ लेकिन पूरी तरह अनुशासन। कहीं कोई अफरा-तफरी नहीं। हमने प्रात: प्रसाद वहीं ग्रहण किया। वहाँ एक समान वर्दी पहने स्थानीय महिलाएं सेवा कर रही थी। काम मनुष्य ही नहीं, मशीनों से भी हो रहा था। सब यंत्रवत, बहुत सुंदर दृश्य था सचखंड हजूर गुरुद्वारा साहिब का।

एक स्थान पर लगे बोर्ड पर लिखा था- 'इस स्थान को पंजाब के शासक महाराजा रंजीत सिंह द्वारा 1830 से 1839 के दौरान बनवाया गया था। गुरुजी का आदेश था कि उनके नाम पर कोई स्थान न बनाया जाए। जो भी ऐसा करेगा, उसका वंश समाप्त हो जाएगा। महाराजा रंजीत सिंह ने यह जानकर भी गुरु स्थान बनवाया। उनका कहना था, 'गुरु सिख होने के नाते यह मेरा फर्ज है कि मैं अपने गुरु की स्मृति को स्थायी बनाने का कार्य करूं। बेशक मेरा वंश नष्ट हो जाए लेकिन मेरे गुरु का नाम अमर रहना चाहिए। धन्य है वह भारत भूमि जहाँ सर्ववंशदानी गुरु गोविंद सिंह जी ने अवतार लिया और उनके अनुयायी महाराजा रंजीत सिंह भी खुशी से अपना सर्वस्व समर्पित करने को तत्पर थे।

बताया गया कि प्रतिदिन अमृत बेले गोदावरी नदी से जल की गागर भरकर सचखंड में लाई जाती है। सुखमणि साहिब जी के पाठ की समाप्ति के पश्चात गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश किया जाता है। अरदास के पश्चात संपूर्ण दिवस गुरुद्वारा पाठ और कीर्तन से गूंजता रहता है। संध्या में रहिरास साहिब का पाठ और आरती के बाद गुरु गोबिंदसिंह, महाराजा रणजीतसिंह और अकाली फूलासिंह के प्रमुख शस्त्रों के दर्शन करवाए जाते हैं।

नांदेड़ में सचखंड गुरूद्वारे के अलावा सात अन्य गुरूद्वारे भी हैं जो धार्मिक दृष्टि से अति महत्त्वपूर्ण हैं- गुरुद्वारा नगीना घाट, गुरुद्वारा बंदा घाट, गुरुद्वारा शिकार घाट, गुरुद्वारा हीरा घाट, गुरुद्वारा माता साहिब, गुरुद्वारा माल टेकडी तथा गुरुद्वारा संगत साहिब। सचखंड गुरूद्वारे के नजदीक ही एक बड़ा ही सुन्दर उद्यान गोविन्द बाग़ है जहाँ प्रतिदिन शाम सात से आठ बजे तक सिखों के दसों गुरुओं का परिचय तथा खालसा का इतिहास लेजऱ शो के द्वारा दिखाया जाता है।. सचखंड गुरूद्वारे से ही गुरुद्वारा बोर्ड के द्वारा बसें उपलब्ध हैं जो की यात्रियों को नांदेड़ के सारे गुरूद्वारे तथा अन्य दर्शनीय स्थानों के दर्शन कराती है। यहाँ की पूरी व्यवस्था तथा देखरेख के लिए गुरुद्वारा बोर्ड तथा मेनेजिंग कमिटी करती है।

सिख धर्म से जुड़े संग्रहालय, गुरुद्वारा लंगर साहिब के अतिरिक्त अन्य महत्त्वपूर्ण दर्शनीय स्थानों में पहाड़ी पर बना रेणुका देवी का मंदिर है जो चारों तरफ घने जंगल से धिरा है। नांदेड़ का किला तीन ओर से गोदावरी नदी से घिरा हुआ है। किले के भीतर एक खूबसूरत बगीचा और सुंदर फव्वारा हैं जो इसकी सुंदरता में बढ़ोतरी करता हैं। पेनगंगा नदी के तट पर स्थित उन्केश्वर में गर्म पानी का झरना है।

चूंकि हिन्दी सम्मेलन शाम को आरंभ होने वाला था इसलिए अपने से पूर्व पधारे साथियों से मिलने -जुलने और उनके अनुभवों को जानने के पश्चात हम औंधा नागनाथ गए जहाँ प्रसिद्ध नागेश्वर ज्योतिर्लिंग है। ऐतिहासिक मंदिर प्रांगण में प्रवेश करते ही लंबी लाइन नजर आयी। हमें शाम से पहले वापस भी पहुँचना था इसलिए दक्षिणावाली लाइन से प्रवेश किया। विष्णु की अति प्राचीन मूर्ति के दर्शनों के पश्चात नीचे बेसमेंट में ज्योतिर्लिंग के दर्शन होते हैं। बहुत तंग सीढिय़ाँ, उसपर भी खड़े होने लायक स्थान नहीं। बैठकर पहुँचे तो देखा अनेक पुजारी दर्शन करवाने के लिए मौजूद थे। इस तरह का शायद यह इकलौता मंदिर है।

मंदिर परिसर में भोजन प्रसाद की विशेष व्यवस्था थी। मात्र दस रूपये में थाली जिसमें दाल, चावल, सब्जी, चटनी, चपाती और न जाने क्या -क्या। सचमुच आनंद आ गया। लखनऊ के डॉ. कृष्ण नारायण पाण्डेय और कर्नाटक के श्री सुनील परित भी थे। मंदिर के बाहर का दृश्य बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता। सरकार को इस स्थान पर साफ-सफाई और सुविधाएं जुटानी चाहिए। आश्चर्य कि देश के ग्यारह ज्योतिर्लिंगों में शामिल इस स्थान से नांदेड़ तक की कोई सीधी व्यवस्था भी नहीं है। यदि इस दिशा में ध्यान दिया जाए तो यह स्थान प्रमुख पर्यटक स्थल के रूप विकसित हो कर स्थानीय जनता की आय में वृद्धि कर सकता है। हमें जल्दी थी इसलिए कई गुना अधिक किराया देकर वहाँ से एक जीप लेकर नांदेड़ पहुँचे।

इस सफर में हमारी मुलाकात विकासपुरी दिल्ली के श्री राजेन्द्र गुप्ता से हुई। आश्चर्य है कि बिलकुल नजदीक रहकर कभी न मिलने वाले सैंकड़ों मील दूर मिलकर मित्र बन गए। रास्ते भर संस्कृत प्रेमी डॉ.पाण्डेय से धर्म-चर्चा होती रही जिसका आनंद सभी सहयात्रियों ने भी लिया।

- विनोद बब्बर

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