अनमोल वचन

अनमोल वचन

हम परमात्मा को शक्ति के द्वारा नहीं श्रद्धा, प्रेम और भक्ति के द्वारा रिझा सकते हैं और इन गुणों को अपने भीतर पैदा करने के लिये भक्त का विनीत और नम्र होना जरूरी है। विनीत ही परम पद को प्राप्त कर सकता है। विनम्रता नहीं तो तप व्यर्थ है। विनम्रता रहित धर्म का कोई अर्थ नहीं रह जाता। अहंकार के कंकड जब तक आपने हृदय में भरे हुए हैं, तब तक परमात्मा के हीरे-मोती उसमें उडेले नहीं जा सकते। अहंकार को अर्न्तहृदय में छिपाकर आप कैवल्य की यात्रा पर नहीं जा सकते। जिस नाम की रक्षा और वृद्धि के लिये आप इतना कुछ उठापटक करते हैं। वह नाम आपका नहीं। जब आप जन्मे थे, अनाम जन्मे थे और जब आप विदा होंगे तो अनाम हो जायेंगे, क्योंकि वर्तमान शरीर के साथ जो नाम आपको मिला, वह उस शरीर के साथ समाप्त भी हो जायेगा। अत: विनम्रता के साथ अपनी मंजिल की ओर कदम बढाते चलिये। जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिये यह शरीर प्राप्त हुआ है, यदि अहंकार का एक कण भी शेष रहा तो मार्ग से भटक जाओगे।

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