अनमोल वचन

अनमोल वचन

दुख और सुख सभी के जीवन में आते हैं। यह स्वाभाविक भी है, परन्तु कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनका दुखी रहने का स्वाभाव बन जाता है। ऐसे लोग अपने छोटे से दुख को भी बढा चढाकर पेश करते हैं, ताकि लोगों का ध्यान उनकी ओर आकर्षित हो सके। सच पूछिये तो जो लोग जीवन में अच्छे कार्यों का प्रदर्शन नहीं कर पाते, सफलता प्राप्त नहीं कर पाते, वैसे ही लोग दुखी रहकर यह बताना चाहते हैं कि यदि मैंने सफलता प्राप्त नहीं की, सुख प्राप्त नहीं किया तो क्या मेरे पास भी काफी दुख हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे किसी की दृष्टि में नीचे गिरना नहीं चाहते। परमात्मा ने किसी को दुखी पैदा नहीं किया, क्योंकि परमात्मा के यहां कोई दुख है ही नहीं, तो वह जीव को दुख कैसे दे सकता है, परन्तु जब मनुष्य अपने कार्यों, अपने विचारों और अपने अहंकार के कारण दुख का स्वयं निर्माण कर लेता है, तो परमात्मा उसमें क्या करे। हमारी भूलों, हमारे पापों के लिये परमात्मा को दोष कैसे दिया जा सकता है। हम तो अपने कारनामों से दुखों को आमंत्रित करते हैं। परमात्मा ने हमें इतना विवेक तो दिया ही है कि अमुक कार्य से हम निश्चित ही दुखों का सामना करेंगे और उन कार्यों को हम फिर से करते हैं तो फिर दोष किसका है, परमात्मा का या हमारा।

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