अनमोल वचन

अनमोल वचन

आदमी का मन अबोध है। उचित-अनुचित का वह ज्ञान नहीं रखता। उसकी स्थिति उस छोटे बच्चे की तरह है, जो केवल इच्छा करता है और उसकी पूर्ति की जिद माता-पिता से करता है, परन्तु आत्मा की स्थिति उस समझदार माता-पिता की तरह होती है, जो यह जानती है कि क्या उचित है और क्या अनुचित, क्या करना चाहिए और नहीं करना चाहिए। मनुष्य जब भी कोई अनुचित कार्य अपने मन से प्रेरित होकर करता है, तब अन्तरात्मा ही उसे अज्ञात संकेत देकर एक बारगी रोकने का प्रयास करती है। हम चाहे उन संकेतों को समझ पाये अथवा नहीं, परन्तु वह बार-बार हमें रोकती-टोकती अवश्य है, चेतावनी भी देती रहती है। बिरले ही होते हैंजो अन्तरात्मा के संकेतों को समझ पाते हैं और अपना जीवन संवारते हैं, उत्थान के मार्ग पर उत्तरोत्तर आगे बढते जाते हैं। हम प्राय: जो भी करते हैं वह अन्त: प्रेरणा से करते हैं। अन्त: प्रेरणा से ही हमारा जीवन संचालित होता है, परन्तु यह अन्त: प्रेरणा मन की होती है न कि अन्तरात्मा की। हमारा मन स्वाभाव से चंचल, उच्दृखंल, ढलान की ओर बहने वाला, कोई भी फिसल जाने वाला तथा प्रवाह में बहने वाला होता है। मन का स्वाभाव ही उछल-कूद मचाना और शोर करना होता है। मन के इस कोलाहल के कारण हम अन्तरात्मा की आवाज सुन ही नहीं पाते और गलतियां कर बैठते हैं, जो बहुधा पश्चाताप का कारण बनती हैं।

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