अनमोल वचन

अनमोल वचन

संसार सुख और दुख दोनों का मिला-जुला रूप है। कोई इसे अपनी सोच से सुखदायी बना लेता है और कोई दुखदायी। सच पूछा जाये तो दोनों स्थिति सिक्के के चित्त पट की तरह हैं। सिक्के को रखा कैसे भी जाये, उसकी कीमत कम नहीं होती। इसी प्रकार जीवन को भी लेना चाहिए। हमारे धर्म ग्रंथों में शिव को बहुत सरल देवता के रूप में दर्शाया गया है। लोकहित में समुद्रमंथन के समय वे स्वयं आगे बढकर विष पीते हैं। जो व्यक्ति विसंगतियों के जहर को सहजता से आत्मसात करता है, तो वह उससे भयभीत नहीं होता और जब विपरीत परिस्थिति को सच में जहर मान लेता है, तो वह घबरा जाता है। विपरीतता प्राय धोखा असफलता आदि से आती है। यदि कोई छल कपट करे, अप्रिय स्थिति पैदा करे और उसे जहर की भांति पीने की परिस्थिति बन जाये, तब उस जहर को भगवान शंकर की तरह कंठ में ही रोक लेना चाहिए। यदि जहर हृदय में उतरा तो मन क्षुब्ध होगा। बदला लेने का भाव जागृत होगा, जिसकी हानि अन्ततोगत्वा उसी की होगी। इतने बडे त्याग के बावजूद भगवान शंकर केवल एक लौटा जल चढाने से प्रसन्न हो जाते हैं। जीवन में जो भी प्राप्त हो रहा है, वह मनुष्य के प्रयासों के अनुसार हो रहा है। इससे सन्तुष्ट होने का स्वाभाव बनाईये, यही शिवत्व है।

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