अनमोल वचन

अनमोल वचन

ईर्ष्या मनुष्य के चरित्र के पराभव का द्वार है। यह ऐसा मनोविकार है, जिससे मनुष्य का मौलिक व्यक्तित्व बुरी तरह आहत हो जाता है। ईर्ष्या एक भयानक मनोरोग है, जो मनुष्य को अकारण दंडित करता रहता है। इसके कारण मनुष्य का सारा व्यक्तित्व विकृत हो जाता है। उसकी अपनी क्रियात्मक शक्ति नष्ट हो जाती है, जिससे उसके अपने व्यक्तित्व को कुछ लेना-देना नहीं रहता। ईर्ष्या हमेशा दूसरों के कारण होती है। ऐसा इसलिए, क्योंकि कोई व्यक्ति स्वयं से ईर्ष्या नहीं करता, उसके लिये दूसरों का होना आवश्यक है। अकेला व्यक्ति कभी भी ईर्ष्या का शिकार नहीं बनता। उसके सामने जब दूसरा आ जाता है, तब उसकी जलन बढ जाती है। आदमी अकेले वर्षों रह सकता है, कभी भी वह ईर्ष्या का पात्र नहीं बनता, लेकिन ज्यों ही दूसरा उसकी बगल में बैठ जाता है, तो ईर्ष्या शुरू हो जाती है। दरअसल कोई भी दूसरे को सहन नहीं कर पाता, वह चाहे राजनीति का क्षेत्र हो, धर्म का क्षेत्र हो, समाज का, परिवार का हो, कहीं भी हम दूसरों को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। इसी कारण ईर्ष्या का जन्म होता है।

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