अनमोल वचन

अनमोल वचन

कोई भी व्यक्ति अपने गुणों से ही पूजनीय बनता है। गुण पूजनीय तब बनते हैं, जब मनुष्य के जीवन में विचार और आचरण का समन्वय होता है। इसके लिये कठोर साधना करनी होती है। वस्तुत: किसी मार्ग को पकडकर उस पर चलते जाना साधना नहीं है। धन, सत्ता और भोग के पीछे आंख मूंदकर दौडने वालों की संख्या कम नहीं है। उनकी उस दौड को साधना नहीं कहा जा सकता। साधना तो उच्च आदर्शों की उपलब्धि के लिये की जाती है। महावीर ने साधना की थी, गौतम बुद्ध ने साधना की थी। उन्होंने राजपाट का मोह छोडा, घर बार का त्याग किया और सारे वैभव को ठुकराकर उस चरम लक्ष्य को पाने का प्रयास किया, जिसे पाने के बाद पाने को कुछ भी नहीं रह जाता। आधुनिक समय में दयानन्द ओर विवेकानन्द आदि ने यही किया। स्वेच्छा से जीवन के अंतिम क्षण तक साधना के मार्ग पर अडिग निष्ठा और मजबूती से चलते रहे। इन युग प्रवर्तकों का स्मरण करके आज भी श्रद्धा से मस्तक ऊंचा हो जाता है। अपने जीवन से उन्होंने बता दिया कि मूल्यों की स्थापना किस प्रकार की जाती है और जीवन को किस प्रकार ऊंचे आदर्शों में ढाला जाता है।

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