अनमोल वचन

अनमोल वचन

संत समागम और सत्संग भाग्यशाली को ही उपलब्ध होते हैं, ऐसे अभागे लोग भी देखे गये हैं, जिनके निवास के समीप कोई सत्संग या संत प्रवचन चल रहा होता है, परन्तु उनमें उन्हें सुनने की उत्कंठा पैदा ही नहीं होती। जब कभी हम दिशाहीन हो जाते हैं, तो सत्संग, रामकथा और संतों का सानिध्य हमें सही राह दिखाते हैं, परन्तु समस्या यह है कि हम उन पर ठीक प्रकार से अमल नहीं कर पाते। कथाओं का प्रचलन तो प्राचीनकाल से है। उपनिषदों और पुराणों में बडी-बडी कथाएं मिलती हैं। कथाएं तो कथाएं होती हैं, वे हमारे जीवन में उतर नहीं पाती, क्योंकि हमने उन्हें कभी अपने जीवन में उतारने का प्रयास भी नहीं किया। यदि व्यक्ति के जीवन में कोई बडा परिवर्तन नहीं हो पाता तो इन कथाओं का सुनन और संत समागम करना निरर्थक ही हुआ। कथाओं के सुनने से पहले आप अपने बारे में विचार करें कि जिस कथा को सुनने के लिये आप बैठे हैं, तो उसके और आपके बीच में कोई दीवार तो नहीं खडी है। उस दीवार को, अवरोध को हटाना होगा, तभी हम उस कथा, सत्संग के मार्ग से उसके माध्यम से सिद्धि के निकट पहुंच सकते हैं, अपने कल्याण का मार्ग पा सकते हैं।

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