अनमोल वचन

अनमोल वचन

मानव जीवन में सेवा अनिवार्य है। यदि सेवा की भावना नहीं है तो दरवाजा बंद करके कोई व्यक्ति बीस घंटा भी प्रभु की भक्ति करे तो उसे कोई आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं होगी। ऐसा इसलिए, क्योंकि परमात्मा का आसन आपके हृदय में भी है और बाहर भी। आप भीतर वाले आसन को ऊंचा बनाना चाहते हैं, वहां दीपक जलाते हैं और बाहर वाले आसन को अंधकार में रख देंगे। इससे काम नहीं चलेगा। दीपक भीतर भी जलाना है और बाहर भी जलाना है। आदमी यह समझता है कि शेष संसार का कुछ भी हो, उसकी तरक्की होनी चाहिए। यह उचित नहीं, समाज की उपेक्षा कर, समाज की अवहेलना कर जो धर्म सिखाया जाता है, वह धर्म नहीं, धर्म का जंजाल है। जो सेवा के योग्य है, सेवा का पात्र है, यदि उसकी सेवा नहीं होगी, उपेक्षा होगी तो तरक्की नहीं हो पायेगी। यदि होगी भी तो उसका कोई अर्थ नहीं। यदि आपके आसपास कोई शोषित, पीडित अथवा अभावग्रस्त है तो आपको मिली तरक्की में आपको कोई शांति नहीं मिलेगी, सुकून नहीं मिलेगा। यदि शांति नहीं, संतोष नहीं, प्रसन्नता नहीं तो फिर ऐसी उन्नति का कोई अर्थ नहीं, कोई प्रयोजन नहीं। महान कौन? महान वह है जो परोपकार करता है, उन्हीं को महत्व मिलता है। परोपकार हेतु अधिक धनराशि नहीं चाहिए, शरीर मजबूत है, शरीर से करो, पैसा है तो पैसे से करो, बुद्धि है तो बुद्धि से करो, कुछ नहीं तो सद्भावना से करो।

Share it
Top