अनमोल वचन

अनमोल वचन

वासना का आकर्षण बडा प्रबल होता है। इस आकर्षण में सिंचाव तो होता है, परन्तु उसका अंत बडा ही दुखद होता है। यह पक्रिया सभी इन्द्रियों पर समान रूप से लागू होती हैं, चाहे वह जीभ का स्वाद लेने की कामना हो या कामेन्द्रिय का सुख। वासना सदा जलाती है, दौडाती है। इस जलन में कहीं कोई शान्ति नहीं है, कोई विराम नहीं है। यह तो अंतहीन सिलसिला है। वासना जब उठती है तो वह शांत नहीं होती, बल्कि भडकती ही जाती है। ठीक वैसे ही जैसे आग में घी डालने पर आग भभक उठती है, शांत नहीं होती है। वासना को कभी शांत होना ही नहीं है। वह अशांत ही रहती है और इन्द्रियों को नष्ट करके भी नहीं थमती। वासना के प्रभाव से इन्द्रियों को लगता है कि उन्हें सुख का अनुभव हो रहा है, परन्तु यथार्थ में ऐसा होता नहीं। बाद में इस 'सुख का परिणाम बडा ही कष्टकारक होता है। इन्द्रिय सुख तो मात्र एक प्रतीति है। प्रतीत होता है कि सुख मिल रहा है, परन्तु इस सुख के पीछे एक दारूण यंत्रणा छिपी रहती है। वासना का उद्गम प्रवाह इस सत्य को प्रकट नहीं होने देता और व्यक्ति सुख की चाहत में निरन्तर दुख बटोरता रहता है। वह पहले तो सुख की चाहत में भोगों को भोगता है, परन्तु बाद में वही योग रोग बनकर मनुष्य का पीछा करते हैं।

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