अनमोल वचन

अनमोल वचन

सेवा धर्म मानवीय सद्गुणों में सर्वोपरि है। इस धर्म को वही धारण कर सकता है, जो अपने निहित स्वार्थ और अहंकार के भाव से ऊंचा उठ चुका हो। सेवा का सार और सुफल, कामना रहित, स्वार्थ रहित कर्मों में निहित है। आज संसार में सेवा करने वालों की अत्यंत आवश्यकता है। कहने को तो सेवा करने वालों की, सेवक कहलाने वालों की अच्छी खासी भीड दिखाई देती है, परन्तु थोडा गहरे में झांकने से पता चलता है कि इनकी सेवा पर स्वार्थ और अहम् का स्वामित्व है। ये स्वामी भाव में बैठकर सेवा करने चले हैं, जबकि सेवक भाव की सेवा में तो स्व कहीं विसर्जित समर्पित हो जाता है। स्व के स्थान पर बचती है केवल निष्कामता, नि:स्वार्थता और परहित की गहन वेदना। सच्ची सेवा यही है। जो कोई भी इस संसार में सेवा करना चाहता है, उनके लिये निष्काम भावना ही एक मात्र कसौटी है।

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