अनमोल वचन

अनमोल वचन

सत्य साध्य है और असत्य श्रम साध्य। हम बडे प्रयास से निरंतर अपने को ढकते जाते हैं और तब गढते हैं असत्य की प्रतिमा। असत्य को ग्रहण करने में उसे बडा श्रम करना पडता है। एक सतय को छिपाने में हमें अनेक झूठ का सहारा लेना पडता है। शिशु स्वाभाव से निश्छल होता है, किन्तु हम उसे बडे श्रम से असत्य सिखाते रहते हैं। हमारी यह मिथ्या धारणा है कि दुनियादार बनने के लिये असत्य सिखाना जरूरी है। ऐसा करते रहने से परत दर परत उसके भीतर का सूर्य ढकता चला जाता है और वह झूठ के अन्धेरे में भटकने के लिये बाध्य हो जाता है। अबोध बालक शत्रु और मित्र में भेद करना नहीं जानता। वह दोनों को देखकर मुस्कुरा देता है, दोनों की गोद में जाने को आतुर दिखाई देता है। हम उसके मन में भेद पैदा करते हैं। बालक निरंतर समभाव में रहता है। उसके भीतर नफरत की दीवार हम स्वयं खडी करते हैं। बालक दरिद्र, सम्पन्न, कुलीन, अनुलीन, धर्म पंथ, सम्प्रदाय, स्पृश्य-अस्पृश्य में भेद नहीं देखता। हम उसके सामने वर्जनाओं की बाधाएं खडी कर देते हैं। फलस्वरूप वह सत्य के मार्ग से भटक जाता है।

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