अनमोल वचन

अनमोल वचन

हममें एक बडी दुर्बलता यह होती है कि जो हमें नहीं मिला, उसके लिये अपने भाग्य को कोसते हैं, परमात्मा को उलाहना देते हैं, किन्तु जो प्राप्त है, उसका शुक्रिया अदा नहीं करते। हम नाशुके (कृत्घन) हो गये हैं। जो परमात्मा की कृपा से हमें मिला है, उसी में सन्तोष करना सीखें। सन्तोष का यह मतलब नहीं कि हम आगे की प्रगति के लिये प्रयत्न करना छोड दें, उसका तात्पर्य मात्र यह है कि अपना दृष्टिकोण बदलें। दृष्टिकोण बदलते ही मन की खिन्नता का प्रत्यावर्तन प्रसन्नता और उल्लास में हो जायेगा। हर इच्छा आज तक किसी की पूरी नहीं हुई। सबको जो कुछ मिला है, उसी पर सब्र करो। अधिक की प्राप्ति के लिये प्रयत्न करते रहना पडता है। यही क्रम शान्तिदायक है। इसी को अपनाकर हम सन्तोष के अधिकारी बन सकते हैं। प्रतिस्पर्धा गुणों की होनी चाहिए। हम दूसरों की अपेक्षा अधिक विद्वान, स्वस्थ, संयमी, सेवाभावी, सभ्य, सहिष्णु तथा अधिक धार्मिक बनें। ये प्रतिस्पर्धाएं यदि चलने लगें तो व्यक्ति का पतन नहीं, उत्थान होगा।

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