अनमोल वचन

अनमोल वचन

ईर्ष्या एक मानसिक रोग है। ईर्ष्या के रोग से पीडित व्यक्ति दूसरे का तो कुछ अहित नहीं कर सकता, स्वयं अपना खून सुखा लेता है। इस रोग से बचने की कला प्रत्येक व्यक्ति को आनी चाहिए। जिसने यह कला सीख ली और उसके अनुसार अपनी जीवन शैली निर्मित कर ली, उसका जीवन सरल, सहज और आशा से परिपूर्ण हो जाता है। जब हमें लगता है कि दूसरों का जीवन आनन्द में व्यतीत हो रहा है, उन्हें कोई कष्ट नहीं, सबसे अधिक कष्ट में हमारा जीवन है, तो यही विचार ईर्ष्या को बढावा देता है कि हम अपनी समस्याओं और कष्टों के कारण आगे नहीं बढ पा रहे हैं, जबकि दूसरे बिना किसी कठिनाई के ही आगे बढते जा रहे हैं। यदि हमें भी किसी कठिनाई का सामना न करना पडता तो हम भी आगे निकल सकते थे। ऐसा हम इसलिए सोचते हैं कि हमें दूसरों के कष्टों का ज्ञान हीं होता, जबकि सच्चाई यह है कि कुछ न कुछ कष्ट सभी को हैं। इसलिए जरूरी है कि दूसरों की ओर न देखकर अपनी ओर देखा जाये कि मुझसे त्रुटि कहां हो रही है।

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