अनमोल वचन

अनमोल वचन

गुरू के प्रति श्रद्धासुमन के रूप में गोस्वामी तुलसीदास की काव्य पंक्तियां कितनी सारगर्भित हैं। बदऊं गुरू पद कजं कृपा सिंधु नर रूप हरि, महा मोह तम पुंज जासु वचन रबि कर निकर। अर्थात मैं सद्गुरू के चरण कमल की वन्दना करता हूं। मेरे गुरूदेव कृपा के सागर और नर रूप में नारायण हैं। उनके सद्वचन महा मोह के घने अन्धेरे का नाश करने के लिये सूर्य किरणों के समूह है। इन काव्य पंक्तियों में बडी स्पष्टोक्ति है कि सद्गुरू मनुष्य देहधारी होते हुए भी सामान्य मनुष्य नहीं है। वह नर रूप में नारायण हैं, जो उनके प्रति इसी गहरी श्रद्धा के साथ स्वयं को अर्पित करता है, उसे ही उनके वचनों से तत्वबोध होता है, उसके जीवन में सद्गुरू के वचन सूर्य की किरणों की भांति अवतरित होते हैं और महा मोह के घने अन्धेरे को पलभर में नष्ट कर डालते हैं। ऐसी श्रद्धा यदि शिष्य के अन्तर में हो तो ही शिष्यत्व की सच्ची पात्रता प्राप्त की जा सकती है।

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